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सपा-बसपा गठबंधन के बाद वेस्ट यूपी में गरमाई जाट-गुर्जर सियासत, बेहद अहम हैं यहां की सीटें

Tue, 15 Jan 2019 04:07 PM IST
ishwar ashish राजेन्द्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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गठबंधन की घोषणा के बाद उत्साहित सपा-बसपा समर्थक। - फोटो : amar ujala
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सपा-बसपा के गठबंधन के बाद पश्चिमी यूपी में जाट व गुर्जर सियासत गरमाई हुई है। इन पर सपा-बसपा के साथ ही भाजपा व कांग्रेस की भी नजरें लगी हुई हैं। पिछड़े वर्ग में आने वाली ये दोनों बिरादरी चुनाव के लिहाज से काफी अहम मानी जाती हैं। मेरठ व सहारनपुर में दो बड़ी गुर्जर पंचायतों से गुर्जरों के तेवरों का संकेत मिल चुका है। सरकार में मंत्री पद नहीं मिलने से गुर्जर समाज में नाराजगी है तो जाट समाज की नजर काफी हद तक सपा-बसपा गठबंधन में राष्ट्रीय लोकदल की भूमिका पर टिकी हुई है।

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वेस्ट यूपी में मुस्लिम व दलितों के बाद जाट व गुर्जर ही जिलों में चुनावी समीकरणों को प्रभावित करते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में मुजफ्फरनगर दंगे व कुछ अन्य कारणों से इन दोनों ही बिरादरी का रुख प्राय: भाजपा की तरफ रहा था। जाट व गुर्जर समाज की वोटिंग का यह रुझान 2017 के विधानसभा चुनाव में भी रहा। अब लोकसभा चुनाव से पहले इन दोनों बिरादरी का रुख बदला-बदला लग रहा है। इसलिए सभी सियासी दल उन्हें अपने पाले में करने की कोशिश में जुटे हैं।

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सर्वाधिक चार जाट उम्मीदवारों को टिकट दिया। चारों लोकसभा में पहुंच गए थे। सपा ने केवल गाजियाबाद से सुधन रावत को उम्मीदवार बनाया था जबकि बसपा ने किसी जाट को टिकट नहीं दिया था। 2014 की तुलना में अब स्थिति बदली हुई है।
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पिछले साल हुए कैराना लोकसभा उपचुनाव में भाजपा को रालोद प्रत्याशी से हार का सामना करना पड़ा। इसमें जाट वोटरों की अहम भूमिका रही। इस बीच रालोद ने दंगा प्रभावित इलाकों में जाट-मुस्लिम एकता पर काफी काम किया है।

रालोद के परंपरागत वोट बैंक की हुई वापसी

माना जा रहा है कि इससे रालोद के परंपरागत वोट बैंक की काफी हद तक वापसी हुई है। सांप्रदायिक और अविश्वास का माहौल समाप्त हुआ है। इन हालात में सपा-बसपा गठबंधन में रालोद की भूमिका जाट मतदाताओं के बड़े हिस्से का रुख तय करेगी।

रालोद नेता सपा-बसपा के साथ सम्मानजनक समझौते की उम्मीद लगाए हुए हैं। राजधानी लखनऊ में हुई मायावती-अखिलेश की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में रालोद का जिक्र न होने को भाजपा नेता इसे जाट बिरादरी के अपमान के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। अगले कुछ दिनों में साफ होगा कि रालोद की सपा-बसपा गठबंधन में क्या भूमिका रहेगी?

गुर्जरों में नुमाइंदगी की छटपटाहट

पश्चिमी यूपी के कई जिलों की राजनीति में दखल रखने वाली गुर्जर बिरादरी में इन दिनों छटपटाहट है। भाजपा के पांच गुर्जर एमएलए और एक एमएलसी हैं लेकिन किसी को प्रदेश मंत्रिपरिषद में जगह नहीं मिली सकी। पश्चिमी यूपी में भड़ाना व लखीराम-मलूक नागर परिवार गुर्जर राजनीति में दखल रखते हैं। अवतार सिंह भड़ाना खुद मुजफ्फरनगर की मीरापुर सीट से विधायक हैं। वह चार बार सांसद रह चुके हैं।

मलूक नागर व लखीराम नागर का परिवार भी ब्लॉक प्रमुख व जिला पंचायत अध्यक्ष से विधायक व मंत्री तक रह चुका है। इस बार भी इन परिवारों पर नजरें टिकी हुई हैं। मलूक व लखीराम बसपा में हैं तो अवतार भड़ाना भाजपा में हैं। इनके अलावा अलग-अलग जिलों में कई अन्य नेता टिकट की दावेदारी जता रहे हैं।

गुर्जर समाज, बसपा-सपा गठबंधन में मेरठ, गौतमबुद्धनगर, बिजनौर, कैराना, सहारनपुर व अमरोहा में दो-तीन सीटों पर अपने प्रत्याशी की उम्मीद लगाए हुए हैं। वर्ष 2015 में बसपा ने बिजनौर से मलूक नागर के अलावा बागपत व गौतमबुद्धनगर से गुर्जर उम्मीदवार उतारे थे। सपा ने गौतमबुद्धनगर व मुजफ्फरनगर में गुर्जर नेताओं को टिकट दिया था।
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जाट-गुर्जरों को साधने के लिए ताकत झोंकेगी भाजपा

भाजपा भी आसानी से जाट-गुर्जरों को अपने पाले से नहीं जाने देना चाहती है। इसके लिए वह पूरी ताकत झोंकने की तैयारी कर रही है। भाजपा नेताओं को पता है कि इन दोनों बिरादरियों, खासतौर से जाटों के बिना चुनाव में ध्रुवीकरण करा पाना आसान नहीं होगा।

इसीलिए भाजपा नेता चाहते हैं कि रालोद का बसपा-सपा से गठबंधन न होने पाए और गुर्जरों को टिकट वितरण में अपेक्षित नुमाइंदगी न मिले। इससे भाजपा को इन दोनों बिरादरियों को साधने में मदद मिलेगी। भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में बागपत, मुजफ्फरनगर, बिजनौर व फतेहपुर सीकरी से जाट तथा कैराना व अमरोहा से गुर्जर प्रत्याशी उतारे थे। ये सभी विजयी रहे थे।

कैराना से चुनाव जीतने वाले वरिष्ठ भाजपा नेता हुकुम सिंह का निधन हो चुका है। उपचुनाव में इस सीट पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था।
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