नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर शोधपरक पुस्तक एक गुमनाम योद्धा का किया गया विमोचन। स्रोत : स्वयं
अयोध्या में लंबे समय तक रहने वाले गुमनामी बाबा ही क्या नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे। यह प्रश्न हजारों लोगों के मन में आज भी रहस्य ही बना हुआ है। इस रहस्य से पर्दा उठाने का बीड़ा कुछ साल पहले वरिष्ठ साहित्यकार अशोक पांडेय ’अनहद’ ने उठाया था। कई वर्ष शोध के बाद उन्होंने अपने निष्कर्ष को एक पुस्तक में समाहित किया है। इस पुस्तक का नाम है ’एक गुमनाम योद्धा’।
इस पुस्तक का विमोचन शुक्रवार को बख्शी का तालाब स्थित चंद्रिका देवी मंदिर में किया गया।मंदिर के मुख्य पुजारी तीर्थाचार्य पंडित नंदकिशोर शर्मा ’डीएम महाराज’ ने माता के कर कमलों में पुस्तक को भेंटकर विमोचन किया। अशोक पांडेय ’अनहद’ ने बताया कि वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अज्ञातवास में रहने के दौरान सभी स्थलाें पर गए, उनके शिष्यों से मिले और 18 अगस्त 1945 से 16 सितंबर 1985 तक उनके संबंध में सैकड़ों प्रमाणित जानकारियां एकत्र कीं। उन्होंने बताया कि ’एक गुमनाम योद्धा’ नेताजी सुभाष से जुड़े उन रहस्यों को उजागर करती है जिसमें उन्हें 1945 में मृत घोषित किया गया था। पुस्तक अंतत: इस निष्कर्ष रूप में यह भी सिद्ध करती है कि अयोध्या के रहने वाले गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे और उनकी मृत्यु 1945 में न होकर 16 सितंबर 1985 को हुई थी। यह पुस्तक खासकर युवाओं और आने वाली पीढ़ी को ध्यान में रखकर लिखी गई है जिससे उन्हें नेताजी के संबंध में पूरी जानकारी हासिल हो सके।
शोध के लिए पुलिस विभाग से ले ली स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति
वरिष्ठ साहित्यकार अशोक पांडेय ’अनहद’ पुलिस विभाग में कार्यरत थे। इस दौरान साहित्य लेखन भी करते रहे। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने नेताजी के संपूर्ण जीवन पर शोध शुरू किया तो नौकरी की बाध्यता बार-बार आड़े आ रही थी। गुमनामी बाबा के संबंध में सभी दस्तावेजों को एकत्र करने और उस समय के उनके संपर्क में रहे लोगों से मिलने में भी दिक्कत आ रही थी। इसलिए उन्होंने कुछ वर्ष पूर्व ही पुलिस विभाग से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली और पूरी तरह से गुमनामी बाबा की सत्यता को लेकर शोध में जुट गए। इसी शोध का परिणाम पुस्तक ’एक गुमनाम योद्धा’ के रूप में सामने आया है।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर शोधपरक पुस्तक एक गुमनाम योद्धा का किया गया विमोचन। स्रोत : स्वयं