अपनी बेलौस बल्लेबाजी के लिए क्रिकेट प्रेमियों के दिल में अलग जगह रखने वाले टीम इंडिया के पूर्व सलामी बल्लेबाज ने कहा कि मुझे अब न तो बीसीसीआई का डर है, न ही अंपायर का। इसलिए मैं सोशल मीडिया पर खुलकर अपनी बात रखता हूं। ‘अमर उजाला संवाद’ कार्यक्रम में उन्होंने खुलकर अपने खेल के दिनों व सोशल मीडिया में अपनी मौजूदगी पर बात कही।
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अपने कॅरिअर के शुरुआती दिनों में सचिन तेंदुलकर से तुलना किए जाने पर सहवाग ने बताया कि 1992 में जब सचिन को खेलते हुए देखता था और उनके शॉट को कॉपी करने की कोशिश करता था। उनके जैसा बनना चाहता था। भाग्य से उनके साथ खेलने का मौका मिला। एक बार रवि शास्त्री ने कमेंट्री के समय सचिन से मेरी और मेरे खेल तुलना की। मीडिया ने भी सवाल पूछे। मैंने कहा, सचिन और मुझमें काफी अंतर है। खेलने का तरीका एक जैसा हो सकता है लेकिन हमारे बैंक बैलेंस में बड़ा अंतर है।
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लखनऊ से जुड़ी अपनी यादें साझा करते हुए उन्होंने कहा कि यहां शीशमहल टूर्नामेंट होता है। मैं खुद इसमें खेलने आता था। इसके बारे में चर्चित था कि पहली बॉल सुबह छह बजे फिंकती है। मैंने सोचा कि कोई सुबह छह बजे कैसे खेल सकता है? सुबह 6.15 बजे जब पहुंचा तो पता चला कि तीन ओवर फेंके जा चुके थे। कप्तान सुबह 5:45 बजे टॉस कर लेते थे, टीमें बाद में मैदान पर पहुंच पाती थीं। क्रिकेटर ज्ञानेंद्र पांडेय से मेरी मुलाकात यहीं हुई। लखनऊ क्या है, उन्हीं से जाना। उन्होंने एक स्कूटर खरीदा, पर उन्हें चलाना नहीं आता था। उन्होंने स्कूटर चलाने के लिए एक ड्राइवर रखा।’
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सहवाग ने कहा कि मेरा पहला वनडे कोलंबो में था। 256 रन का पीछा करना था। कप्तान सौरव गांगुली ने कहा कि इतने रन का पीछा आज तक यहां किसी टीम ने नहीं किया। मैंने कहा कि अबकी बार हो जाएगा। सौरव मुझे हर बॉल के बाद संभलकर खेलने को कहते थे। लेकिन, मैं अगली ही बॉल पर चौका मारता था। हारकर सौरव ने मुझे अपने ही तरीके से खेलने दिया। मेरा मानना है कि अगर डर मन में आ गया तो फिर जीत नहीं।
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सहवाग ने कहा कि यूपी में टैलेंट की कोई कमी नहीं है। कैफ व रैना यहीं से निकले हुए हैं। अगर आप में टैलेंट है जुनून है तो फिर आपको कोई रोक नहीं सकता।
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भारतीय क्रिकेट टीम में आज भी खिलाड़ियों के नाम के हिसाब से स्टैंडर्ड तय होते हैं कि फ्लॉप होने पर टीम में रखा जाएगा या नहीं। सचिन के लिए अलग स्टैंडर्ड होगा। सहवाग के लिए अलग, जहीर खान के लिए अलग स्टैंडर्ड। एक जैसा स्टैंडर्ड बनाइए कि चार मैच में प्रदर्शन खराब तो टीम से बाहर कर दिया जाएगा। यह सबके लिए लागू हो। कई बार ऐसा हुआ कि वापसी के बाद खिलाड़ी अच्छा खेले। मैं 2006 में जब ड्रॉप किया गया। मेरा प्रदर्शन ठीक नहीं चल रहा था। उसके बाद अनिल कुंबले ने भरोसा दिखाया और 2008 में वापसी हुई। मोहिन्दर अमरनाथ तो निकाले जाने और वापसी के रिकॉर्ड बनाए। पार्थिव पटेल आठ साल के बाद टीम में वापसी कर पाया।
अपने कॅरिअर में दो तिहरे शतक लगाने वाले सहवाग ने कहा कि मुझे पाकिस्तान के बॉलर्स के खिलाफ बड़े शॉट लगाने में मजा आता था। सहवाग ने एक किस्सा सुनाते हुए कहा कि पाकिस्तान के बॉलर्स के सामने मैं पहली बार 1999 में मोहाली में खेला। सिर्फ दो गेंद खेलने को मिलीं। इन दो बाल में इतनी गालियां खाईं कि वे मेरे जेहन में बैठ गईं। तभी सोच लिया कि गालियों का बदला बल्ले से चुकाना है। 2004 में मुल्तान टेस्ट में ट्रिपल सेंचुरी लगाकर जवाब दिया। सबसे तेज सेंचुरी भी इसमें बनी। पता नहीं क्यों पाकिस्तान के बॉलर्स को देखकर बड़े शॉट मारने की मन करने लगता था।