विनीत चतुर्वेदी
लखनऊ। मंदिरों में अर्पित फूल अब केवल श्रद्धा का प्रतीक नहीं, बल्कि स्वावलंबन और हरित भविष्य की सुगंध भी बिखेर रहे हैं। राजधानी के चिनहट की 46 वर्षीय वंदना सिंह मंदिरों में अर्पित फूलों से धूप और अगरबत्तियां बनवाकर महिलाओं को रोजगार से जोड़ा। अब वही फूल हर्बल गुलाल के रूप में नई पहचान पा रहे हैं। इस पहल से 90 महिलाओं को नियमित रोजगार मिल रहा है।
वंदना के समूह की महिलाएं हर मंगलवार और शनिवार को शहर के आठ प्रमुख मंदिरों से प्रतिदिन लगभग 10 क्विंटल गेंदा, गुलाब और अन्य फूल एकत्र करती हैं। इन्हें सुखाकर और प्राकृतिक विधि से संसाधित कर शुद्ध हर्बल गुलाल तैयार किया जाता है। हर्बल गुलाल के लिए वंदना ने नाबार्ड से 15 दिन का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद इस कार्य को संगठित रूप दिया।
वाराणसी और अयोध्या जैसे शहरों में भारी मांग
वंदना बताती हैं कि इस होली पर लखनऊ, वाराणसी और अयोध्या जैसे बड़े शहरों के लिए लगभग 20 क्विंटल हर्बल गुलाल तैयार किया जा रहा है। यह गुलाल पूरी तरह प्राकृतिक है, जिससे न केवल त्वचा सुरक्षित रहती है बल्कि रासायनिक रंगों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान से भी बचाव होता है।
हर्बल गुलाल से त्वचा रहती है सुरक्षित
हर्बल गुलाल प्राकृतिक फूलों से बनता है, जिससे एलर्जी, खुजली और रैशेज का खतरा कम होता है। साथ ही यह आंखों और बालों के लिए भी सुरक्षित है। फूलों से तैयार होने के कारण इसमें प्राकृतिक सुगंध होती है। इसमें रसायनों का उपयोग नहीं होता, इसलिए यह मिट्टी और जल स्रोतों को प्रदूषित नहीं करता।
मंदिरों पर अर्पित फूलों से बना रही हर्बल गुलाल। स्रोत ः स्वयं