यूपी विधानमंडल का आगामी सत्र सिर्फ सरकारी कामकाज ही नहीं निपटाएगा, बल्कि सदन में बड़े चेहरों की भूमिका के बारे में भी बहुत कुछ बताएगा। संत से सांसद और सांसद से मुख्यमंत्री बने योगी के सियासी कौशल की परीक्षा होगी तो यह भी पता चलेगा कि अब तक सवाल पूछने वाले योगी जवाब देने वाली भूमिका में कितने खरे उतरते हैं।
दूसरी तरफ विपक्ष में बैठे अपनों के वार से घायल सूबे के बड़े सियासी चेहरों का अगला कदम किस तरफ उठने वाला है। इनकी चाल किसी नई सियासी पार्टी के अस्तित्व में आने का संकेत दे रही है या इनके कदम किसी नए सियासी ठिकाने की तलाश की ओर उठ रहे हैं। दुश्मनों की दोस्ती और दोस्तों की दुश्मनी की कहानी का भी यह सदन साक्षी बनने वाला है।
दरअसल, यह सदन कई लिहाज से नए उदाहरण सामने रखने वाला होगा। प्रदेश में पहली बार योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री के रूप में लोगों के सरोकारों से जुडे़ सवालों के जवाब देंगे जो अभी तक सांसद के रूप में सवाल पूछने वाली भूमिका में ही रहे हैं। इसलिए खास तौर से यह देखने वाला होगा कि लगभग दस वर्षों से संसद में तीखे सवालों से सरकार को निशाने पर लेते रहे योगी विपक्ष के तीखे प्रश्नों पर संयम बरतते हैं, सहजता से उन्हें संतुष्ट करने वाले उत्तर देते हैं या पहले की तरह ही उनके तेवर तीखे दिखाई देते हैं।
यह जिज्ञासा इसलिए भी है क्योंकि सरकार के गठन के बाद अवैध बूचड़खाने बंद कराने, कानून-व्यवस्था व एंटी-रोमियो दस्ते के गठन जैसे कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिन पर विपक्ष की तरफ से तीखे सवाल होना स्वाभाविक है।
क्या भूमिका अपनाएंगे अखिलेश
अखिलेश यादव
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पांच साल सरकार का नेतृत्व करने वाले अखिलेश यादव विधानमंडल के किसी भी सदन में तकनीकी लिहाज से प्रमुख भूमिका में नहीं हैं। विधानसभा के वह सदस्य नहीं हैं, लिहाजा उन्हें विधानसभा में सपा विधायक दल की कमान रामगोविंद चौधरी को सौंपनी पड़ी है।
जाहिर है विधानसभा में वह सरकार के खिलाफ खड़े नजर नहीं आएंगे। पर, उच्च सदन विधान परिषद जिसके वह सदस्य हैं, उसमें भी उन्होंने सपा विधायक दल की कमान अहमद हसन को सौंपकर खुद की अतिरिक्त खिलाड़ी की भूमिका तय कर दी है।
हालांकि यह तो सदन चलने पर ही साफ होगा कि अखिलेश परिषद में कितना समय देते हैं और कितने सक्रिय रहते हैं? पर, सियासी गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि कहीं अखिलेश भी मायावती की तरह सत्ता से बाहर होने पर सदन की सियासी गतिविधियों से दूर रहने की राह पर ही तो आगे नहीं बढ़ रहे हैं।
सत्ता से हटने पर सियासत व सदन से बना ली थी दूरी
मायावती
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मायावती बसपा सरकार बनने पर मुख्यमंत्री के रूप में विधानसभा या विधान परिषद की सदस्य रहीं, पर जब भी बसपा सत्ता से बाहर हुई तो उन्होंने यूपी की सियासत और सदन से दूरी बना ली।
विधानसभा और विधान परिषद में रहकर प्रदेश सरकार का विरोध करने के बजाय उन्होंने केंद्रीय राजनीति में सक्रिय रहना ज्यादा पसंद किया। मायावती को इसका नफा-नुकसान क्या हुआ, यह बहस का मुद्दा है, पर राजनीतिक पंडितों के मुताबिक, संसदीय लोकतंत्र के लिए यह स्थिति ठीक नहीं है।
राजनीति शास्त्री प्रो. एसके द्विवेदी कहते हैं कि अखिलेश हों या मायावती, दोनों का यह रवैया संसदीय लोकतंत्र के लिए तो घातक है ही लेकिन इसका कम नुकसान इन्हें और इनके दलों को भी नहीं होने वाला।
क्या करेंगे नसीमुद्दीन
नसीमुद्दीन सिद्दीकी
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नसीमुद्दीन सिद्दीकी लंबे समय से विधानमंडल में बसपा के प्रमुख चेहरे रहे हैं। यह पहला मौका होगा जब सदन में होते हुए भी वह बसपा के साथ नहीं होंगे। बसपा से निष्कासित होने के बाद तकनीकी रूप से वह असंबद्ध सदस्य के रूप में परिषद की कार्यवाही में हिस्सा ले सकते हैं। इसलिए सिद्दीकी की सदन में भूमिका पर सभी की निगाहें लगी हुई हैं।
खास तौर से देखने वाली बात यह होगी कि उनके निशाने पर सरकार होगी या बसपा? यह भी देखने वाला होगा कि हमला बोलने में सिद्दीकी को किस सियासी पार्टी का सहारा मिलता है या किस सियासी शख्स की उनके साथ सहानुभूति दिखती है, इससे यह आगे के समीकरणों का पता चल जाएगा। संकेत इसके भी मिलेंगे कि वह किसी के साथ जाएंगे या अपनी पार्टी बनाएंगे।
नजरें शिवपाल व अंबिका पर भी
शिवपाल यादव
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शिवपाल सिंह यादव और अंबिका चौधरी पर भी सदन की निगाहें रहेंगी। देखने वाला होगा कि भतीजे की चालों से घायल शिवपाल सदन में मौन धारण किए रहते हैं या सक्रिय भूमिका में दिखाई देते हैं। उनके निशाने पर कौन रहता है। वह सरकार पर हमला बोलते हैं या नहीं। अगर बोलते हैं तो उन्हें किसका साथ और सहारा मिलता है।
इससे यह पता चलेगा कि शिवपाल सेकुलर मोर्चा बनाने की राह पर आगे बढ़ने को तैयार हैं या हालात से समझौता कर चुके हैं। अंबिका चौधरी विधान परिषद में सपा के सदस्य हैं, पर वह चुनाव के दौरान बसपा में शामिल हो चुके हैं। देखने वाली बात होगी कि चौधरी सदन में आते हैं या नहीं? आते हैं तो कहां बैठते हैं? किस पर हमला बोलते हैं और किसके साथ खडे़ होते हैं?
अगर वह सपा के साथ ही बैठते हैं और इसी पार्टी के साथ वह सरकार पर निशाना साधते हैं तो यह साफ हो जाएगा कि वह बसपा में शामिल भले ही हो गए थे लेकिन बिखर रही उस पार्टी में अब उन्हें अपना भविष्य दिखाई नहीं दे रहा है।
इसलिए वह खुद को सपा में ही बनाए रखना चाहते हैं। अगर वह सदन में नहीं आते हैं या आकर चुप रहते हैं तो भी उससे उनके अगले सियासी कदम का संकेत मिल जाएगा।
दीक्षित की दक्षता पर भी दृष्टि
हृदयनारायण दीक्षित
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पूर्व संसदीय कार्यमंत्री हृदयनारायण दीक्षित की संसदीय और सियासी दक्षता पर भी लोगों की नजरें रहेंगी। खास तौर से देखने वाली बात यह होगी कि विधायक व एमएलसी के रूप में सदस्यों के अधिकारों को लेकर सरकारों को कठघरे में खड़ा करने वाले दीक्षित अब विधानसभा अध्यक्ष के रूप में किस तरह सदस्यों के अधिकारों की रक्षा करते हैं।
वे किस तरह विधानसभा को व्यवस्थित तरीके से चलाते हैं। सदस्यों को उनके सवालों का सरकार से संतुष्ट कराने वाला उत्तर कैसे दिलाते हैं?
साथ ही सरकार को सदन के प्रति जवाबदेह बनाने और सदस्यों को उनकी सूचनाओं पर समय से जवाब दिलाने पर भी उनकी भूमिका सभी की निगाहों में रहेगी।