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यूपी: जेलों में चलता है अपराधियों का कानून

Sat, 23 Nov 2013 09:32 PM IST
विवेक त्रिपाठी/लखनऊ
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सूबे की जेलों में दो तरह के कानून चलते हैं। एक कानून सरकार का है तो दूसरा अपराधियों का।
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एक वक्त था जब जेल में खाकी का भय होता था लेकिन बीते एक दशक से जेलों का सिस्टम अपराधियों के हाथों में है।

हनक, खनक और धमक से यह सिस्टम चलता है। मनमानी पर लगाम कसने या पंगा लेने की कोशिश पर जेल अफसरों को जान देकर कीमत चुकानी पड़ती है।

वाराणसी के डिप्टी जेलर अनिल त्यागी, जेल अधीक्षक लखनऊ आरके तिवारी, जेलर अशोक गौतम, मेरठ के डिप्टी जेलर नरेंद्र द्विवेदी सहित जेल के कई अफसरों की हत्या इसका उदाहरण हैं।

मर्जी से लगती है ड्यूटी
जेल में बंद अपराधी जितना बड़ा होता है, अंदर उतनी ही उसकी दबंगई चलती है। जेल में रहकर भी ये अपना गैंग चलाते हैं। मनचाही बैरक, लजीज भोजन, सिगरेट-शराब और मोबाइल फोन के लिए ये अपराधी हर महीने मोटी रकम खर्च करते हैं। दरबार में बैठने वाले शागिर्दों की ड्यूटी इनकी मर्जी पर लगाई जाती है।
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जेल के एक रिटायर्ड अफसर बताते हैं कि यह परंपरा पूर्वांचल के दो बहुचर्चित विधायकों ने शुरू की। उन्होंने जेलों को अपने इशारे पर चलाया।

जेल का स्टाफ उन्हें ऐशो-आराम की चीजें उपलब्ध कराता था। अब कुछ अपराधी दबंगई करते हैं तो कुछ पैसे की बदौलत सुविधाएं लेते हैं।

जेलों को सुरक्षित ठिकाना मानते हैं अपराधी
रिटायर्ड अफसर कहते हैं कि बड़े अपराधी अपने घर से ज्यादा जेल में ही रहना पसंद करते हैं। सलाखों के पीछे वे अपने दुश्मनों से सुरक्षित रहते हैं। इसके साथ ही यहां पैसा खर्च कर उन्हें गैंग ऑपरेट करने की तमाम सुविधाएं मुहैया हो जाती हैं।

जेल से ही यह अपराधी भाड़े पर हत्याएं कराते हैं और रंगदारी वसूलते हैं। माफिया डॉन बबलू श्रीवास्तव जेल से रीयल एस्टेट का कारोबार चला रहा है।

आजमगढ़ के पूर्व विधायक सर्वेश सिंह सीपू और पूर्व पार्षद श्याम नारायन पांडे पप्पू की हाल ही में हुई हत्या का खाका सलाखों के पीछे ही खींचा गया था। सीरियल किलर सलीम अब तक तिहाड़ जेल से ही रंगदारी वसूल रहा है।
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पूर्व एडीजी लॉ एंड ऑर्डर ने जताई थी चिंता
पूर्व एडीजी कानून व्यवस्था अरुण कुमार ने दो माह पहले ही जेलों में अपराधियों के बढ़ते वर्चस्व पर चिंता जताई थी। उन्होंने इन पर लगाम कसने की बात कही थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इससे अपराधियों का दुस्साहस बढ़ता जा रहा है।
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