‘हिंदी राष्ट्रभाषा घोषित हो या न हो, लेकिन लोगों ने इसे राष्ट्रभाषा स्वीकार कर लिया है। आज या कल, दबाव में आकर सरकार को इसे राष्ट्रभाषा घोषित करना ही होगा। वह बाजारीकरण का दौर था, जब लगा कि हिंदी घुटकर रह जाएगी। अखबारों से लेकर स्कूलों तक में अंग्रेजी हावी हो गई, लेकिन हिंदी की ताकत देखिए कि उसने उदारीकरण व बाजारवाद को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। 1857 से लेकर आजादी की सभी प्रमुख लड़ाइयां हिंदी में लड़ी गईं। इसीलिए महात्मा गांधी ने इसकी ताकत को समझा था। हिंदी की ही ताकत है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात छोड़कर उत्तर प्रदेश आए’। ये विचार उप्र हिंदी संस्थान के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ‘भारत-भारती’ अलंकृत प्रो. काशीनाथ सिंह ने व्यक्त किए।
आलोचक नहीं, पाठकों के लिए लिखता हूं
काशीनाथ ने कहा, 55 साल से खड़ा हूं। प्रोफेसर हूं, परिवार का भरण-पोषण करता हूं। पर, यह सिर्फ जीविका है, जीवन नहीं। इसलिए लेखन के जरिये लगातार खुद की खोज में लगा रहता हूं। खुद को ही ढूंढते-ढूंढते ‘काशी का अस्सी’ तक पहुंच गया। मेरा लेखन आलोचकों के लिए नहीं, बल्कि पाठकों के लिए है, क्योंकि मैं लोकप्रियता नहीं, लोक को ध्यान में रखता हूं।
उन्होंने कहा कि हिंदी संस्थान के पुरस्कार वितरण समारोह में कथाकार, कवि, आलोचक, वैज्ञानिक, डॉक्टर, हिंदीसेवी सब आते हैं। संस्थान चाहे तो इसे राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय पर्व घोषित कर दे।
70 साहित्यकारों को पुरस्कार वितरित किए गए
‘काशी का अस्सी’ और ‘रेहन पर रग्घू’ जैसे उपन्यासों के जरिये बनारस की खालिस संस्कृति और मध्यमवर्गीय समाज का जीवंत चित्रण करने वाले साहित्यकार डॉ. काशीनाथ सिंह सोमवार को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के सर्वोच्च पुरस्कार ‘भारत-भारती’ से अलंकृत किए गए। सम्मानस्वरूप उन्हें पांच लाख रुपये प्रदान किए गए।
वहीं दिल्ली की मृदुला गर्ग लोहिया साहित्य सम्मान से नवाजी गईं। उन्हें चार लाख रुपये प्रदान किए गए। हिंदी दिवस परकरीब 70 साहित्यकारों को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के वर्ष 2014 के पुरस्कार वितरित किए गए।
संस्थान के यशपाल सभागार में आयोजित समारोह में संस्थान के अध्यक्ष मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने साहित्यकारों को सम्मान राशि, अंगवस्त्र व प्रशस्ति पत्र प्रदान किया। उन्होंने कहा कि एक समय था जब नए-नए चैनल, अंग्रेजी हावी हो रहे थे। तब ऐसा लगा कि कहीं हिंदी दब न जाए, लेकिन खुशी है कि हिंदी का फैलाव व प्रचार हुआ, जिसमें चैनलों की भी भूमिका रही।
समाजवादियों ने हिंदी की ताकत के लिए भारतीय भाषाओं को भी प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि हिंदी को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के बराबर खड़ा करने की जरूरत है। कई देश अपनी भाषाओं में काम कर तरक्की पा चुके हैं, उम्मीद है कि हिंदी के साथ भी ऐसा ही होगा। उन्होंने हिंदी संस्थान के कर्मचारियों से जुड़ी मांगों पर कार्रवाई का आश्वासन भी दिया।
तकनीकी शब्दों का हिंदी में अनुवाद जरूरी
विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय ने कहा कि तकनीकी शिक्षा में हिंदी के ज्यादा शब्द उपलब्ध नहीं हैं, जिससे अंग्रेजी की सहायता लेनी पड़ती है। ऐसे में तकनीकी शब्दों का सरल अनुवाद किया जाना जरूरी है। रूस, जापान, जर्मनी जैसे देश अपनी भाषा के जरिये ही आगे बढ़े हैं। इस मौके पर मंत्री राजेंद्र चौधरी, संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह, निदेशक सुधाकर अदीब, अनिल मिश्र भी उपस्थित रहे। संचालन डॉ. अमिता दुबे ने किया।
साहित्य भूषण सम्मान
प्रताप दीक्षित, डॉ. पुष्पा भारती, राजकृष्ण मिश्र, डॉ. रामकठिन सिंह, डॉ. रंगनाथ मिश्र सत्य, डॉ. रमा सिंह, कमल नयन पांडेय, मोहनदास नैमिशराय, बलराम, उमाशंकर सिंह यादव पथिक। प्रत्येक साहित्यकार को दो-दो लाख रुपये प्रदान किए गए।
सौहार्द सम्मान
डॉ. तरसेम गुजराल(पंजाबी), प्रो. गजानन चव्हाण(मराठी), जगमल सिंह(मणिपुरी), डॉ. विजय कुमार महंती (उड़िया), डॉ. ए. भवानी(तमिल), श्रीकृष्ण शर्मा (डोगरी), डॉ. गौरीशंकर रैणा (कश्मीरी), मासूम गाजियाबादी (उर्दू), डॉ. एम रंग्यया (तेलुगु), डॉ. केएम मालती (मलयालम), कीर्ति नारायण मिश्र (मैथिली) और डॉ. रेवाप्रसाद द्विवेदी (संस्कृत)। प्रत्येक को दो-दो लाख रुपये दिए गए।
लखनऊ के ये साहित्यकार हुए सम्मानित
राजकृष्ण मिश्र व रंगनाथ मिश्र सत्य को साहित्यभूषण सम्मान दिया गया। वेदा राकेश को कलाभूषण सम्मान, डॉ. चक्रधर नलिन को बाल साहित्य भारती सम्मान मिला। नलिन का पुरस्कार पवन कुमार ने ग्रहण किया। भालचंद्र तिवारी को मधु लिमये साहित्य सम्मान, डॉ. ओमप्रकाश मिश्र को विद्याभूषण सम्मान तथा डॉ. विनोद जैन व डॉ. सुधीर शुक्ल को विश्वविद्यालयस्तरीय सम्मान दिया गया।
नामित व सर्जना पुरस्कारों के तहत त्रिवेणी प्रसाद दुबे ‘मनीष’, नीरजा हेमेंद्र, एपी मिश्र, रोशन प्रेमयोगी, डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ‘मृदुल’, गजाल जैगम, पूर्व डीजीपी महेशचंद्र द्विवेदी, रजनी गुप्त, शीला पांडे, पंकज प्रसून सम्मानित किए गए।
इन्हें मिले नामित पुरस्कार
भगवती प्रसाद द्विवेदी, आचार्य सूर्य प्रसाद शर्मा ‘निशिहर’, डॉ. अर्जुन तिवारी, लक्ष्मण दास रायक्वार, त्रिवेनी प्रसाद दुबे ‘मनीष’, सुरेश कुमार शुक्ल ‘संदेश’, डॉ. रामबोध पांडेय, डॉ. शोभा अग्रवाल चिलबिल, डॉ. बी. नाज, डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ‘मृदुल’, चंद्रप्रकाश शुक्ल, रोशन प्रेमयोगी, हरिनारायण तिवारी, आनंद कुमार सिंह, रमाकांत कुशवाहा कुशाग्र, अमलदार नीहार, रविशंकर पांडेय, जयप्रकाश त्रिपाठी, विजय तिवारी, ओमप्रकाश शर्मा, विवेक मिश्र, जितेंद्र कुमार सिंह संजय, आद्या प्रसाद द्विवेदी, केशव प्रसाद वाजपेयी, विजय रंजन, गजाल जैगम, महेश चंद्र द्विवेदी, श्रीप्रकाश शुक्ल। प्रत्येक को 50 हजार रुपये की राशि प्रदान की गई।
लेखकों पर हो रहे हमलों पर साहित्यकारों ने जताया आक्रोश
शाहजहांपुर से लेकर बंगलूरू तक कलम की धार को दबाने के जो प्रयास हुए हैं, उससे रचनाकारों में काफी रोष है। हिंदी संस्थान के पुरस्कार वितरण समारोह में साहित्यकारों ने ऐसे वारदातों की एक स्वर में भर्त्सना की।
पं. दीनदयाल उपाध्याय साहित्य सम्मान से अलंकृत प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने कहा कि साहित्य व साहित्यकारों की आवाज कोई नहीं दबा सकता। हालांकि यह भी सच है कि राजनीति ऐसा प्रयास लगातार करती रहती है।
महाकवि गंग की बुलंद आवाज, जो अवाम में जागृति पैदा कर रही थी, को भी बादशाह जहांगीर ने दबाया था। वहीं मासूम गाजियाबादी ने कहा कि अगर ऐसा ही होता रहा तो ऐसी भी नौबत आ सकती है कि न्यायालयों व न्यायाधीशों के खिलाफ भी आवाज उठे और हमले हों।
साहित्यभूषण सम्मान से नवाजे गए डॉ. राम कठिन सिंह ने कहा कि अगर लोकतंत्र में भरोसा है तो दूसरों को सुनने की ताकत भी होनी चाहिए। मधु लिमये सम्मान से सम्मानित डॉ. भालचंद्र तिवारी ने कहा कि ऐसी घटनाओं के पीछे कहीं न कहीं देश के कर्णधारों की चुप्पी भी जिम्मेदार है।
...जब आ गया नेताजी का फोन
हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह मंच से अपनी बात कह रहे थे। उन्होंने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से कहा कि पुरस्कार वितरण समारोह पर हर बार कुछ न कुछ डिमांड होती रही है, जिसे सरकार ने पूरा किया है। कर्मचारियों को नियमित भी किया गया।
...अब कर्मचारियों को राज्य कर्मचारियों की तरह सुविधाएं दी जानी चाहिए। इसी बीच उनका फोन बज उठा, दूसरी छोर पर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव थे। ...कार्यकारी अध्यक्ष ने जैसे बताया कि नेताजी का फोन है, सभागार में बैठे लोग खिलखिलाने लगे।
फिर छोटा पड़ गया सभागार
इससे पहले भी कई बार पुरस्कार वितरण समारोह के दौरान यशपाल सभागार छोटा पड़ गया था। सोमवार को भी कई पुरस्कृत साहित्यकारों व उनके परिवारीजनों को कुर्सियां नहीं मिल सकीं। साहित्यकारों ने कहा कि संगीत नाटक अकादमी या फिर इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजन कराया जाना चाहिए, ताकि बैठने की समस्या न हो।