यूपी के भाजपाइयों की निगाहें अब दिल्ली की ओर हैं। दिल्ली में 17 जनवरी से 19 जनवरी तक पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति और राष्ट्रीय परिषद की बैठक है।
लोकसभा चुनाव के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही इस बैठक में उत्तर प्रदेश के बारे में भी विस्तार से चर्चा होने की संभावना है।
कारण, पार्टी संविधान के मुताबिक, तीन महीने में एक बार राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक बुलाई जाती है। इस नाते अगली बैठक मार्च के अंतिम सप्ताह या अप्रैल के पहले पखवाड़े में पड़ेगी।
तब तक चुनाव अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच चुका होगा। इसलिए इसी बैठक में लोकसभा चुनाव के लिहाज से तैयारियों को अंतिम रूप देना स्वाभाविक है।
सभी को पता है कि ‘मिशन मोदी’ को परवान चढ़ाने का ज्यादातर दारोमदार उत्तर प्रदेश पर ही निर्भर है। सबसे ज्यादा 80 सीटों वाले इस राज्य में भाजपा के इस समय 10 सांसद ही हैं।
रणनीतिकारों को मालूम है कि दिल्ली में सत्ता का सपना तभी पूरा होने की उम्मीद पाली जा सकती है जब यूपी की सीटों पर ज्यादा से ज्यादा भाजपा के उम्मीदवार जीतें।
यही नहीं, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) रामलाल उत्तर प्रदेश के हैं। इसके अलावा कल्याण सिंह, उमा भारती, वरुण गांधी और योगी आदित्यनाथ जैसे अन्य कई ऐसे चेहरे भी हैं।
उत्तर प्रदेश के हैं जो भगवा तेवरों वाले माने जाते हैं। इसलिए उत्तर प्रदेश पर सबसे ज्यादा चर्चा स्वाभाविक है।
बड़े नेताओं की प्रतिष्ठा
इसकी वजह भी है, क्योंकि यूपी से अपेक्षा के अनुरूप सीटें न आने से यह सभी नेता प्रभावित होंगे। इनका दबदबा कमजोर पड़ सकता है और पार्टी के भीतर भी इनकी क्षमता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।
इसलिए यह सभी बैठक के जरिये उत्तर प्रदेश की जमीन को भाजपा के अनुकूल बनाने के उपाय तलाशने की भरसक कोशिश करेंगे।
इसके लिए यूपी के संगठनात्मक ढांचे की समीक्षा के साथ बूथ कमेटियों और चुनाव संबंधी अन्य तैयारियों पर चर्चा स्वाभाविक है। साथ ही प्रत्याशियों को लेकर चल रही कवायद और उनकी घोषणा पर भी चर्चा होगी।
तलाशना होगा समाधान
मोदी के पटेल प्रतिमा निर्माण को अभियान के बारे में यूपी का फीड बैक बहुत अच्छा नहीं है। ऊपर से पार्टी के भीतर खींचतान और जगह-जगह सूबे के नेताओं के कामकाज को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं की तरफ से विरोध की खबरों ने पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को और चिंता में डाल दिया है।
नेतृत्व की चिंता की एक बड़ी वजह यह है कि प्रदेश अध्यक्ष डा. लक्ष्मीकांत वाजपेयी के विरोध में पश्चिम में आवाजें सार्वजनिक होने लगी है तो कल्याण सिंह के खिलाफ भी उनके अपने इलाके से ही विरोध के सुर हैं।
युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष आशुतोष राय के फैसलों के विरोध में गोरखपुर के कार्यकर्ताओं की तरफ से पिछले इस्तीफा देने का सिलसिला लंबे समय तक जारी रह चुका है।
अल्पसंख्क मोर्चा के पदाधिकारियों पर शुरू हुआ विवाद अभी खत्म नहीं नहीं हो पाया है। प्रदेश के मूल संगठन के गठन को लेकर शुरू हुए विवाद भी अभी तक जारी हैं।
प्रदेश प्रभारी अमित शाह की बैठकों में पिछले दिनों जमीनी सच्चाई उजाकर हो चुकी है। बूथ कमेटियों के गठन की पोल भी शाह के सामने खुल चुकी है।
यूपी से ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने का संकल्प लेकर चल रहे पार्टी के केंद्र्रीय नेतृत्व को इन समस्याओं के समाधान का रास्ता भी बैठक में तलाशना होगा।