बंदर पकड़ने को लेकर नगर निगम और वन विभाग के बीच करीब पांच वर्षों से असमंजस की स्थिति बनी हुई थी। दोनों विभाग जिम्मेदारी लेने से बचते रहे, जिससे आमजन को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। शनिवार को जारी शासनादेश को लाखों लोगों के लिए राहत देने वाला माना जा रहा है। बंदरों के काटने के मामलों में रैबीज का खतरा बना रहता है। अकेले लखनऊ में प्रतिदिन 10 से 12 मामले सामने आते हैं। प्रदेशभर में बीते एक वर्ष में ऐसे 10800 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। अनुमान के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में 55 हजार से अधिक लोग बंदरों के हमलों का शिकार हो चुके हैं, हालांकि घायलों की आधिकारिक संख्या किसी भी विभाग के पास संकलित रूप में उपलब्ध नहीं है।
जारी आदेश के अनुसार, नगर निगम की जिम्मेदारी उन पशु-पक्षियों तक सीमित है जिनसे गंदगी या सार्वजनिक असुविधा उत्पन्न होती है, जैसे छुट्टा पशु, लावारिस कुत्ते या कीड़े-मकौड़े। बंदर वन्यजीव हैं, जिनकी प्रवृत्ति पालतू पशुओं जैसी नहीं होती। उनकी विभिन्न प्रजातियां होती हैं और उनके प्रबंधन, पकड़ने तथा पुनर्वास के लिए विशेष प्रशिक्षण व विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है, जो नगर निगम के पास नहीं है। यह विशेषज्ञता वन विभाग के पास उपलब्ध होने के कारण जिम्मेदारी उसी को सौंपी गई है।
कुछ वर्षो से वन विभाग ने यह कहना शुरू कर दिया था कि बंदर नगर निगम को पकड़ना है जबकि शासन की ओर से ऐसा कोई शासनादेश भी जारी नहीं हुआ था। अब शासन की ओर से स्थिति स्पष्ट कर दी गई है। बंदर पकड़ना वन विभाग की ही जिम्मेदारी है। -डॉ. अरविंद राव, अपर नगर आयुक्त