कैबिनेट ने वर्ष 2025-26 के उन पात्र छात्रों के लिए छात्रवृत्ति के साथ शुल्क भरपाई के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी है, जिन्हें विभिन्न कारणों भुगतान नहीं हो पाया था। इनके लिए छात्रवृत्ति का पोर्टल दुबारा खोला जाएगा। इन छात्रों की कुल संख्या 3 लाख 16 हजार 57 है। इस पर 551.85 करोड़ रुपये का व्यय-भार आएगा।
इन छूटे छात्रों में एससी, एसटी, सामान्य, अन्य पिछड़ा और अल्पसंख्यक वर्ग के छात्र शामिल हैं। सामान्य, ओबीसी और अल्पसंख्यक वर्ग के छात्रों के लिए देयता अगले वित्त वर्ष में बकाया न रहने का प्रावधान है। यानी, वित्त वर्ष समाप्त होने पर संबंधित विभागों पर देयता का भार नहीं रहता है। इसलिए इस प्रस्ताव को कैबिनेट में लाना पड़ा।
ये छात्र शिक्षण संस्थान, विश्वविद्यालयों और संबद्धता देने वाली एजेंसियों के स्तर पर मास्टर डाटा लॉक नहीं होने के कारण लाभ नहीं पा सके थे। डीएलएड आदि का परीक्षाफल समय से न आने, पीएफएमएस से रिजेक्ट होने, फीस न भरे होने, जिलास्तरीय समिति पर आवेदन लंबित रहने या ट्रांजेक्शन फेल होने के कारण भुगतान नहीं हो सका था।
राज्य सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी जनित सेवा नीति-2022 में कई महत्वपूर्ण संशोधनों को मंजूरी दी है। इसका मुख्य उद्देश्य राज्य में निवेश को आकर्षित करना, नवाचार (इन्नोवेशन) को बढ़ावा देना और बड़े पैमाने पर उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार सृजित करना है। इससे छोटे शहरों में भी आईटी पार्क बनाने का रास्ता साफ हो गया है।
इस संशोधन के जरिये उप्र ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) नीति और अन्य प्रगतिशील राज्यों की तर्ज पर एक प्रतिस्पर्धी और आकर्षक निवेश माहौल तैयार किया जाएगा। संशोधित नीति के तहत प्रदेश में पहले से स्थापित और भविष्य में आने वाली लघु, मध्यम तथा वृहद आईटी/आईटीईएस इकाइयों के विकास के लिए पात्रता मानकों को सरल और लचीला बनाया गया है।
अब पूंजी निवेश आधारित मॉडल के साथ-साथ रोजगार सृजन और व्यवसायिक क्षमता को भी पात्रता का मुख्य पैमाना माना जाएगा। इसका सबसे बड़ा फायदा टियर-2 और टियर-3 शहरों में काम कर रहे स्टार्टअप्स और नई आईटी कंपनियों को मिलेगा। इसके तहत आईटी पार्क और आईटी सिटी स्थापित करने के लिए जरूरी न्यूनतम भूमि (क्षेत्रफल) की अनिवार्यता को भी तर्कसंगत और व्यावहारिक बना दिया है। स्टार्टअप्स, नए उद्यमियों और सूक्ष्म एवं लघु आईटी इकाइयों को सस्ते और किफायती कार्यस्थल (वर्कस्पेस) उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान दिया गया है। इसके लिए को-वर्किंग स्पेस डेवलपर्स को नीति के तहत सरकार की ओर से पूंजीगत सहायता (कैपिटल असिस्टेंस) दी जाएगी।