देश की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी से नरेंद्र मोदी का लोकसभा का चुनाव लड़ना यूं ही नहीं था। यह भविष्य की तैयारी थी, जिसमें अयोध्या के जरिये विपक्ष को मुसलमानों को एकजुट करने का मौका देने के बजाय बाबा विश्वनाथ के जरिये सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेंडे का संदेश देना शामिल था। राजनीतिक विश्लेषक प्रो. एपी तिवारी कहते हैं, मोदी की रणनीति पूर्वांचल के बहाने उत्तर प्रदेश की चिकित्सा, शिक्षा, रोजगार और जन सुविधाओं की समस्या को मुद्दा बनाना था। तभी तो उन्होंने कांग्रेस को ही नहीं, बल्कि प्रदेश में उस समय सत्तारूढ़ सपा और उससे पहले सरकार में रही बसपा को भी निशाने पर लिया था। हिंदुत्व के एजेंडे को सीधे-सीधे मंदिर के बजाय आस्था और सनातन संस्कृति की मान्यताओं के सरोकारों से सम्मान देने के संदेश से समीकरण साधने की तैयारी की थी।
योगी का पश्चिम से चुनाव अभियान
साल 2017 की बात करें तो प्रतीकात्मक राजनीति के माहिर मोदी और शाह जानते थे कि पश्चिम से प्रचार शुरू करते ही मुजफ्फरनगर एवं कैराना के सहारे हिंदुत्व के समीकरण सधने लगेंगे, जो भाजपा को लाभ पहुंचाएंगे। गोरक्ष पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ की पश्चिम में कई स्थानों पर सभाएं कराना इसी रणनीति का हिस्सा था। मोदी व शाह समझते थे कि योगी की आक्रामक शैली, वेशभूषा, हिंदुत्व के सरोकारों की प्रतीक गोरक्षपीठ का पीठाधीश्वर होना और उनकी पीठ का अयोध्या आंदोलन का मुख्य सूत्रधार होना, हिंदुत्व के एजेंडे को मुद्दा बना देगी। साथ ही योगी पर हमला बोलने के लिए विपक्ष के पास उन्हें मुस्लिम विरोधी या सांप्रदायिक बताने के अलावा दूसरा कोई मुद्दा नहीं है।
सोशल इंजीनियरिंग पर काम
अमित शाह ने उत्तर प्रदेश भाजपा का प्रभारी बनते ही संगठनात्मक तौर पर पार्टी की मजबूत जमीन तैयार करने का काम शुरू कर दिया था। संगठनात्मक ढांचा चुस्त-दुरुस्त बनाने के साथ भाजपा से गुटबाजी खत्म करने के लिए कई नेताओं का संगठन में हस्तक्षेप खत्म हो चुका था। उन्होंने 2014 के चुनाव से पहले जिस तरह प्रदेश में दौरे किए और बूथ तक के कार्यकर्ताओं का डाटा तैयार कराकर उनसे निरंतर संपर्क व संवाद का काम शुरू कराया था, उसका भी लाभ मिल रहा था। उन्होंने पिछड़ों और अनुसूचित जाति के दारा सिंह चौहान, कौशल किशोर, स्वामी प्रसाद मौर्य, बसपा के संस्थापकों में शामिल दीनानाथ भाष्कर जैसे लोगों को पार्टी में शामिल कराकर इनके माध्यम से पिछड़ी और दलित जातियों को यह संदेश दिया कि भाजपा सिर्फ ब्राह्मण-वैश्यों की पार्टी नहीं है।
चेहरों से लेकर समीकरणों तक पर ध्यान
मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद भी प्रदेश के विधानसभा चुनाव पर नजर टिकाए थे। उन्होंने प्रधानमंत्री आवास, शौचालय सहित कई योजनाओं में गरीबों को केंद्र से मिलने वाले लाभ में रोड़े डालने का आरोप प्रदेश की तत्कालीन अखिलेश सरकार पर लगाए। कानून-व्यवस्था को मुद्दा बनाया। साथ ही ‘उत्तर प्रदेश में बिजली आती कम और जाती ज्यादा’ जैसे बयानों से अखिलेश सरकार पर हमला बोला।
राष्ट्रीयता के समीकरणों से बनाया काम
प्रधानमंत्री मोदी ने विधानसभा चुनाव प्रचार में पाकिस्तान पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक का जिक्र किया, साथ ही खुद को उत्तर प्रदेश वाला बताते हुए इस फैसले का उल्लेख कर लोगों को राष्ट्रवाद के मुद्दे पर भावनात्मक रूप से जोड़ने की कोशिश की। राजनीतिशास्त्री प्रो. एसके द्विवेदी कहते हैं, भाजपा की 2017 की जीत की वजहों में प्रमुख कारण आशावाद और राष्ट्रीयता के साथ 14 वर्षों से प्रदेश में राजनीतिक वनवास भी रहा। मोदी ने जिस तरह सीमाओं की सुरक्षा को लेकर आक्रामक रणनीति का एजेंडा सेट किया, हिंदू तीर्थ स्थलों की उपेक्षा का मुद्दा उठाया, उससे लोग प्रभावित हुए।
पन्ना प्रमुखों के जरिये एक-एक वोट पर नजर
मोदी और शाह के भाजपा की केंद्रीय राजनीति में आने से पहले की बातें याद करें तो प्रदेश के चुनाव अभियान में पन्ना प्रमुख जैसी कोई रणनीति नहीं थी। शाह ने मतदाता सूची के एक पन्ने का एक प्रमुख नियुक्त कर एक-एक मतदाता को बूथ तक पहुंचाने की योजना पर काम कराया। इसका भाजपा को लाभ मिला।
आने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर योगी सरकार के कामकाज पर नजर डालें तो जहां तमाम उपलब्धियां सामने हैं, तो कुछ ऐसे सवाल भी खड़े दिखाई देते हैं जो आने वाले चुनाव में भाजपा के लिए चुनौती नजर आ रहे हैं। सरकार बनने के बाद से विधायकों से लेकर भाजपा कार्यकर्ताओं की तरफ से अधिकारियों की मनमानी और पुलिस की निरंकुशता का सवाल उठता रहा है। वहीं कोविड महामारी के दौरान लोगों की जान बचाने के लिए कई कदम उठाने के बावजूद त्रासदी के दौरान भर्ती के लिए मारामारी और ऑक्सीजन की कमी के कारण लोगों की जान चली जाने से उपजी नाराजगी की चुनौती से निपटना है। वहीं, टीईटी का पर्चा लीक होना भी सरकार के लिए चुनौती बनेगा। इस परीक्षा में करीब 20 लाख अभ्यर्थी शामिल हैं।
उभ्भा कांड
सोनभद्र जिले का एक गुमनाम गांव उभ्भा उस समय पूरे देश में सुर्खियों में छा गया, जब एक जमीन पर कब्जे को लेकर हुए विवाद में दबंगों ने गोली मारकर 11 आदिवासियों की हत्या कर दी। वहीं, दो दर्जन से अधिक लोग घायल हो गए थे। हालांकि सरकार ने त्वरित कार्रवाई करके इस मामले को शांत करने की कोशिश की, लेकिन विपक्ष इसे मुद्दा बनाने की कोशिश कर सकता है ।
लखीमपुर खीरी कांड
लखीमपुर खीरी कांड पर भी विपक्ष सरकार को घेरने की कोशिश कर सकता है। इस मामले में भाजपा के सांसद व केंद्र में मंत्री अजय मिश्र का पुत्र जिस तरह आरोपों के घेरे में आया, उसे विपक्ष चुनावी हमले के लिए हथियार बना सकता है।
बिकरू कांड
कानपुर के बिकरू कांड में जिस तरह 8 पुलिस कर्मियों की जान गई, साथ ही जिस तरह इसको लेकर ब्राह्मणों की उपेक्षा का सवाल उठाया गया, उससे साफ है कि यह चुनाव में विपक्ष का मुद्दा बन सकता है।
हाथरस कांड
हाथरस में एक दलित युवती से दुष्कर्म की घटना ने भी प्रदेश की सियासत में काफी हलचल मचाई थी। विपक्ष इसे भी चुनाव में मुद्दा बना सकता है ।
रोजगार की चुनौती
सरकार दावा कर रही है कि उसने 4 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार दिए हैं। ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ का भी काम करके सरकार ने इस मुद्दे पर चुनौती से निपटने की तैयारी की है। पर, रोजगार को लेकर जिस तरह सवाल उठ रहे हैं उसके मद्देनजर विपक्ष इसे मुद्दा बना सकता है।
महंगाई
वैसे तो महंगाई का ताल्लुक सीधे प्रदेश सरकार से नहीं है, पर विपक्ष इसे चुनावी हथियार बना सकता है ।
भाजपा ने चुनाव में डबल इंजन सरकार को बड़ा मुद्दा बनाया। पीएम मोदी ने मेरठ की पहली रैली से लेकर पूर्वांचल के अंतिम छोर तक जितनी रैलियां कीं, उनमें उन्होंने केंद्र की योजनाओं का लाभ प्रदेश के लोगों को नहीं मिलने के लिए तत्कालीन अखिलेश सरकार को जिम्मेदार ठहराया।
योगी आदित्यनाथ ने भी इस मुद्दे को लगातार धार दी। लोगों के दिमाग में यह बात बैठाई कि प्रदेश में हिंदुत्व के सरोकारों से जुड़े स्थलों को सजाने-संवारने और गरीबों, किसानों व महिलाओं के कल्याण की योजनाओं के काम तभी हो पाएंगे जब भाजपा की सरकार बनेगी।
किसानों की कर्जमाफी, बिजली आपूर्ति, चिकित्सा सुविधा के इंतजाम, हर खेत को पानी, भ्रष्टाचार पर लगाम, पुलिस तंत्र में सुधार, शिक्षा संस्थाओं को विस्तार, बुंदेलखंड और पूर्वांचल के विकास के लिए बोर्ड, राम मंदिर निर्माण की प्रतिबद्धता, सांस्कृतिक विकास और धार्मिक पर्यटन जैसे तमाम वादों के जरिये भावी सरकार का रोडमैप समझाया गया।
ध्रुवीकरण के मुद्दों को भुनाया
भाजपा ने ध्रुवीकरण को हवा देने वाले मुद्दों को भरपूर भुनाया। तीन तलाक के खिलाफ माहौल बनाने से लेकर श्मशान बनाम कब्रिस्तान को लेकर आक्रामक अभियान चला। यह भी जोर-शोर से उठा कि ईद पर पूरी बिजली मिल सकती है तो होली पर क्यों नहीं। केंद्र की भाजपा सरकार पहले ही इफ्तारी की परंपरा से किनारा कर चुकी थी, इसे लेकर प्रदेश के मंत्री आजम खां ने तंज भी कसा था।