सरकारी मेडिकल कॉलेजों और निजी अस्पतालों की फार्मेसियों में एक ही कंपनी और ब्रांड की दवाओं की संस्थागत आपूर्ति अलग एमआरपी पर होने का मामला खुलने पर एफएसडीए ने पड़ताल शुरू कर दी है। 214 अस्पतालों की फार्मेसियों से जुटाए आंकड़ों के अध्ययन में 167 दवाओं की एमआरपी में अंतर मिला है।
एफएसडीए ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) से इसकी सूची साझा की है। पड़ताल में सबसे ज्यादा 27390 रुपये का अंतर फाइजर की इनोंजा में मिला। इंटास की एल्बुसेल में 7986 व 10989 रुपये और बेनेटास में 56991 व 62690 रुपये की एमआरपी मिली।
न्यूकाइन की एमआरपी 591 और 1247 रुपये मिली। कोलिस्टिमेथेट 4.5 एमआईयू में 8018.44 से 9702.31 रुपये, पॉलीमॉक्सिन बी में करीब 3811 से 4980.94 रुपये और ट्रेजाम में 1874.06 और 1999 रुपये की एमआरपी मिली। टर्लिप्रेसिन इंजेक्शन की एमआरपी 2600 और 3050 रुपये दर्ज हुई। इसके अलावा मेनैक्ट्रा वैक्सीन में 250 रुपये, एंटी-डी 300 एमसीजी में 297 रुपये, 14-वैलेंट न्यूमोकोकल वैक्सीन में 335 रुपये और ऑक्ट्रीओटाइड 100 एमसीजी में 73.33 रुपये का अंतर मिला।
सालाना 10% तक संशोधन की गुंजाइश
एफएसडीए के मुताबिक दवाओं की कीमतों में सालाना अधिकतम 10 फीसदी तक संशोधन की गुंजाइश है। इसके बाद भी एक ही उत्पाद की संस्थागत आपूर्ति में अलग-अलग एमआरपी से कीमत निर्धारण की प्रक्रिया पर ही सवाल उठ रहे हैं। विभाग देख रहा है कि क्या अलग-अलग एमआरपी फार्मा कंपनियों और स्वास्थ्य संस्थानों के बीच तय व्यावसायिक शर्तों के कारण हैं।