शहरी निकायों का हिस्सा बने गांवों में स्थित सरकारी संपत्तियों का ब्योरा अब निकाय चुनाव से पहले निहीं मल पाएंगी। नगर विकास विभाग के निर्देश के बाद भी अब तक किसी विभाग ने अपनी संपत्तियों का ब्योरा नहीं भेजा है। दरअसल, नगर निकायों में शामिल किए गए गांवों में अवस्थापना विकास का खाका इन संपत्तियों के आधार पर ही खींचा जाना है, लेकिन फिलहाल ऐसी संपत्तियों की जानकारी नहीं मिल पाने की वजह से सरकार की उस कोशिश को झटका लगा है, जिसमें चुनाव से पहले विकास के कार्यक्रम शुरू किए जाने थे।
बता दें कि 2017 के बाद से लेकर अब तक कुल 111 नये नगर निकायों का जहां गठन हुआ है. वहीं लखनऊ, वाराणसी, गोरखपुर, कानपुर जैसे बड़े नगर निगमों समेत कुल 130 पुराने नगर निकायों का विस्तार किया गया है। इससे तमाम गांव नगर निकायों की सीमा यानि शहरी क्षेत्र में शामिल हो चुके हैं। नगर निकायों की सीमा में शामिल गांवों में सिंचाई, राजस्व, ग्राम्य विकास, ग्राम पंचायत और पशुपालन जैसे विभागों के भवन या जमीन पड़े हैं। इसलिए सरकार की मंशा थी कि इन भूमि या संपत्तियों को चिह्नित करके इसपर शहरी सुविधाओं का विकास किया जाए।
इसके मद्देनजर सरकार ने गांवों को नगर निकायों में शामिल करने केसबंध नगर विकास विभाग द्वारा अधिसूचना जारी किए जाने के बाद से ही संबंधित विभागों से गांवों की संपत्तियों का ब्योरा उपलब्ध कराने के निर्देश दिया गया था। साथ ही संपत्तियों का ब्योरा उपलब्ध कराने वाले लेखपालों को ब्योरा शपथ पत्र के साथ उपलब्द कराने को कहा गया था। ताकि गांवों में उपलब्ध सरकारी भूमि पर सरकार की मंशा के मुताबिक विकास की कार्ययोजना तैयार कराई जा सके।
दरअसल, नगर विकास विभाग चाहता था कि पहले ही उसे सरकारी जमीनों का ब्योरा मिल जाए ताकि यहां शहरी जरूरतों के लिहाज से विकास के पहले सार्वजनिक जमीनों पर कब्जा हो तो उसे खाली करवा लिया जाए। हालांकि अबतक किसी भी विभाग ने निकायवार अपनी संपत्तियों का ब्योरा नगर विकास विभाग को नहीं सौंपा है।
अवैध कब्जे मुश्किल करेंगे प्लानिंग की राह
दरअसल सरकार की मंशा थी कि निकाय चुनाव के पहले शहरी इलाकों में शामिल हुए गांवों के विकास को डीटेल्ड प्रॉजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करा लिजा जाए। ताकि जनता में गांवों के विकास को लेकर साकारात्मक संदेश दिया जा सके। लेकिन दूसरे विभागों द्वारा अपनी संपत्तियों का ब्योरा उपलब्ध न कराए जाने की वजह से अब चुनाव से पहले डीपीआर तैयार हो पाना मुश्किल है। सूत्रों का कहना है गांवों में स्थित बहुत सी सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा है। ऐसे में चुनाव से पहले गांवों के विकास का खाका तैयार करने की मंशा पर पानी फिर सकता है।