सूत्र बताते हैं कि उपरोक्त बसें मानकों के विपरीत थीं। लिहाजा उनका पंजीकरण करने में काफी समय तक टालमटोली की जाती रही। इसके बाद जब दलालों ने एंट्री ली और अफसरों से सांठगांठ की, जिसके बाद पंजीकरण हो सका। 50 हजार रुपये प्रति बस उगाही कर अफसरों तक पहुंचाए गए।
इन मानकों की होती है जांच
- उत्सर्जन की जांच होती है। ताकि प्रदूषण जांचा जा सके।
- बस बॅाडी व डायमेंशन में लंबाई, चैाड़ाई, ऊंचाई चेक होती है।
- टायर के केंद्र से बस के अगले व पिछले हिस्से की दूरी नियमानुसार हो।
- आपातकालीन निकास, दरवाजे व खिड़कियों पर इमजरेंसी एग्जिट लिखा हो।
- स्पीड गवर्नर चेक होता है। स्पीड लिमिट डिवाइस सील है या नहीं।
- पैनिक बटन व व्हीकल लोकेशन सिस्टम।
-आंतरिक बनावट में सीटों की क्षमता परमिट के अनुसार होनी चाहिए। सीटों के बीच जगह पर्याप्त होनी चाहिए।
-अग्निशमन यंत्र कम से कम दो हो, सही जगह पर लगे होने चाहिए।
-रिफ्लेक्टिव टेप लगे हों, वायरिंग छिपी हुई होनी चाहिए।
-लाइट, इंडिकेटर, ब्रेकलाइट व बस के अंदर की लाइटें।
लखनऊ संभाग के आरटीओ प्रशासन संजय तिवारी का कहना है कि नई बसों के पंजीकरण के लिए मानकों की जांच की जाती है। इन मामलों की जांच करवाई जाएगी। मानक विपरीत पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई होगी। साथ ही बसों का पंजीकरण भी निरस्त किया जाएगा।