सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में लगी एक्स-रे मशीनों से होने वाला विकिरण मरीजों के साथ आसपास के क्षेत्र में रहने वालों को भी बीमार बना सकता है।
मशीन से होने वाला विकिरण और उसके दुष्प्रभावों के बढ़ते आंकड़े को देख लोगों और एक्स-रे टेक्नीशियन को जागरूक करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सभी राज्यों में विकिरण निदेशालय खोलने का आदेश जारी किया।
स्वास्थ्य विभाग ने कोर्ट के आदेश को मानते हुए निदेशालय तो खोल दिया, लेकिन उसमें होने वाले प्रशिक्षण कार्य आज तक नहीं हो सके।
अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली एक्स-रे, सीटी स्कैन, कोबाल थेरेपी, इमेज इंटेसिफायर, सीआर्म मशीन आदि से विकिरण निकलता है।
इससे मशीन को चलाने वाले टेक्नीशियन और मरीज जानलेवा बीमारियों के शिकार हो रहे थे।
इसको देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2008 में राज्य सरकारों को विकिरण निदेशालय बनाने का आदेश दिया।
लखनऊ में बनाया गया निदेशालय
इसके बाद लखनऊ में टूड़ियागंज में विकिरण निदेशालय बना दिया गया, जिसमें प्रदेश भर के सभी पंजीकृत सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों के टेक्नीशियन का प्रशिक्षण होना था, जिसमें विकिरण से बचाव के तौर-तरीकों की जानकारी दी जानी थी।
स्वास्थ्य विभाग ने आदेश के अनुसार सिविल, बलरामपुर, लोहिया और डफरिन अस्पताल के वरिष्ठ एक्स-रे टेक्नीशियन को रेडिएशन सेफ्टी ऑफिसर (आरएसओ) बना दिया।
इसके अलावा जिला अस्पतालों में आरएसओ की नियुक्ति कर दी। नियमत: हर छह महीने पर सभी आरएसओ का विकिरण निदेशालय में प्रशिक्षण होना था। आदेश के पांच साल बाद भी किसी एक्स-रे टेक्नीशियन का प्रशिक्षण नहीं हुआ।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, सभी आरएसओ को प्रशिक्षण देने के बाद उनको स्वास्थ्य विभाग एक विशेष सर्टिफिकेट जारी करता, लेकिन बिना प्रशिक्षण के एक्स-रे टेक्नीशियन काम करने को मजबूर हैं।
भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (बीएआरसी) ने एक्स-रे और दूसरी अन्य मशीनों से होने वाले रेडिएशन के खतरों के आधार पर रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें ये पता लगाया गया था कि मशीन से निकलने वाली रेडिएशन का खतरा कितना रहता है।
विशेषज्ञों की मानें तो सरकारी अस्पतालों के साथ प्राइवेट अस्पतालों में भी नियमों को ताक पर रखकर मरीजों का एक्स-रे किया जा रहा है।
आलम ये है कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा तैनात किए गए रेडिएशन सेफ्टी ऑफिसर प्रशिक्षण के अभाव में काम करने को विवश हैं।
एमओयू नहीं हुआ साइन
स्वास्थ्य निदेशालय के एक आला अधिकारी ने बताया कि जब विकिरण निदेशालय की स्थापना के बाद इसके संचालित के लिए भारत सरकार के एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड से मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) साइन होना था, लेकिन पांच साल बाद भी प्रदेश सरकार भारत सरकार से एमओयू साइन नहीं करा सकी।
इससे टेक्नीशियनों के प्रशिक्षण का पूरा काम लटक गया।