समाजवादी पार्टी द्वारा प्रदेश के राज्यपाल पर लगाए गए आरोपों पर खुद राज्यपाल राम नाईक का कहना है कि यह राजनीतिक बयान है और इसका जवाब देना उनके पद की गरिमा के अनुकूल नहीं है।
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मंगलवार को एक निजी यूनिवर्सिटी में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने मीडिया से कहा कि वे एक ऐसे संवैधानिक पद पर हैं, जहां से इस तरह के आरोपों का जवाब देना उचित नहीं है।
सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने सोमवार को कहा था कि राज्यपाल का व्यवहार संघ के कार्यकर्ता जैसा है और केंद्र सरकार उन्हें प्रदेश से वापस बुलाकर केंद्रीय मंत्री बना दे।
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इस पर राज्यपाल ने कहा कि ‘रामगोपाल जी ने जो भी कुछ कहा, वह सभी को मालूम है। यह उनका राजनीतिक बयान है। मैं एक संवैधानिक पद पर हूं। इस पद पर होते हुए राजनीतिक बयानों पर कोई टिप्पणी करना अपने पद की गरिमा के अनुकूल नहीं मानता, इसलिए कोई टिप्पणी नहीं करुंगा।
सोशल मीडिया सकारात्मक माहौल बनाए
वहीं सोशल मीडिया पर उन्होंने कहा कि कि सोशल मीडिया के सकारात्मक उपयोग को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। नकारात्मक गतिविधियों को हाईलाइट करने के बजाय सकारात्मक चीजों पर बात की जानी चाहिए, इससे एक प्रभावशाली माध्यम की उपयोगिता बढ़ेगी।
मंगलवार को राजधानी में पब्लिक रिलेशन सोसाइटी ऑफ इंडिया (पीएसआरआई) के लखनऊ चैप्टर द्वारा आयोजित सेमिनार में बतौर मुख्य अतिथि राज्यपाल ने यह बात कही। एक निजी विश्वविद्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम में एक्सपर्ट्स ने सोशल मीडिया पर अपने विचार रखे।
पब्लिक रिलेशन में सोशल मीडिया के अवसर और चुनौतियां विषय पर आयोजित इस सेमिनार में अपने राज्यपाल ने बरेली में महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह की प्रकाशित कुछ खबरों का उदाहरण सामने रखा।
उन्होंने कहा कि एक अंग्रेजी और एक हिंदी अखबार (अमर उजाला नहीं) ने उन्हें धूल से एलर्जी होने की खबर प्रकाशित कर बताया कि इस वर्ष दीक्षांत समारोह से पहले यूनिवर्सिटी अपने सभागार का कालीन बदलकर फर्श की टाइलिंग करवा रही है। राज्यपाल ने कहा कि वे 82 वर्ष के हैं, लेकिन ऐसी कोई एलर्जी नहीं है।
मुझसे बिना पूछे वायरल कर दी एलर्जी होने की बात
राज्यपाल नाईक ने कहा कि खबर छपने के दिन उन्हें 40-50 फोन कुशलक्षेम पूछने के लिए आए। उन्हें गुस्सा आया कि उनकी बीमारी के बारे में उनसे ही नहीं पूछा गया और एलर्जी की बात वायरल कर दी गई।
उन्होंने अंग्रेजी दैनिक को इसे सुधारने के लिए कहा तो जहां एलर्जी की खबर चार कॉलम छपी थी, सुधार तीन लाइन में छाप दिया गया। यह बताता है कि मीडिया का उपयोग गलत बातें वायरल करने के लिए नहीं होना चाहिए।
सोशल मीडिया खासतौर से दंगों के दौरान अफवाहें फैलाने में उपयोग किया जाता है, जिस पर हमें सोचना होगा। राज्यपाल ने कहा कि सोशल मीडिया वरदान है, लेकिन अफवाहों की वजह से यह अभिशाप बन जाएगा।
कार्यक्रम में सहयोगी बनी एमिटी यूनिवर्सिटी लखनऊ कैंपस के प्रो-वीसी मेजर जनरल (रिटायर्ड) केके ओहरी ने सभी अतिथियों का अभिनंदन किया। तो वहीं पीएसआरआई लखनऊ के अध्यक्ष डॉ. अशोक शर्मा और सचिव मोनालिसा चौधरी ने राज्यपाल और राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अजित पाठक का अभिनंदन किया।
सेमिनार में विभिन्न सत्र आयोजित किए गए, जिनमें पीआरएसआई उत्तर के उपाध्यक्ष नरेंद्र मेहता, आईआईएमसी अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. जयश्री जेठवानी, महेंद्र मेहता, प्रमुख सचिव सूचना नवनीत सहगल ने अपने विचार रखे।
राज्यपाल ने मुख्यधारा के मीडिया की रिपोर्टिंग को विश्वसनीय बताया और कहा कि अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने जो बातें कहीं, वे कभी गलत अर्थों में नहीं छापी गईं।
उन्होंने कहा कि खबरों का प्रकाशित करना बेहद संवेदनशील काम है और सकारात्मक दृष्टि से यह काम किया जाना चाहिए। इससे मीडिया और सोशल मीडिया, सभी समाज के लिए बेहद उपयोगी साबित होते हैं। उन्होंने हर व्यक्ति को संकल्प लेने की जरूरत बताई कि वे सभी सोशल मीडिया पर केवल सकारात्मक बातें ही फैलाने का काम करेंगे।
उन्होंने कहा कि सेमिनार के दौरान सामने आई उपयोगी बातों को वे प्रदेश के विश्वविद्यालयों में उपयोग करने की सिफारिश करेंगे।
‘हिज एक्सीलेंसी’ अंग्रेजों की याद दिलाता है कार्यक्रम प्रस्तुतकर्ताओं द्वारा राज्यपाल को ‘हिज एक्सीलेंसी’ संबोधन से पुकारा गया था। इस पर उन्होंने कहा कि यह शब्द उन्हें अंग्रेजों और उनके शासन काल में प्रचलित वातावरण की याद दिलाता है। इनका उपयोग अब भारत में नहीं होना चाहिए।