हाईकोर्ट के आदेश देने के तकरीबन तीन माह बाद यूपी सरकार ने सार्वजनिक स्थलों, राजमार्गों, गलियों, फुटपाथों, सड़क किनारे बने अवैध धार्मिक स्थलों को हटाने का आदेश दिया है।
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आदेश एक जनवरी 2011 या उसके बाद बने अवैध धार्मिक स्थलों पर लागू होगा। मुख्य सचिव ने निर्देश दिया कि धार्मिक निर्माण व अतिक्रमण करने वाले छह महीने में कब्जे हटा लें अथवा उसे हटवा दिया जाए।
इस संबंध में हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने 10 जून 2016 को आदेश दिया था और दो माह में अनुपालना रिपोर्ट मांगी थी।
मुख्य सचिव राहुल भटनागर ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि सार्वजनिक स्थलों पर किसी भी कीमत पर अवैध धार्मिक निर्माण न होने पाए।
उन्होंने इस संबंध में सभी मंडलायुक्तों, जोनल पुलिस महानिरीक्षकों जिलाधिकारियों, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों, पुलिस अधीक्षकों व संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों को कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। मुख्य सचिव ने कहा है कि सभी जिलाधिकारी ऐसे अतिक्रमण हटाने के बाद इसकी रिपोर्ट संबंधित प्रमुख सचिव व सचिव को सौंपें।
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अवैध निर्माण रोकने की जिम्मेदारी इन अफसरों पर संबंधित तहसीलों, जिलों के उप एसडीएम, डीएम, सीओ, एसएसपी, एसपी तथा सड़कों, राजमार्गों के रखरखाव के लिए जवाबदेह अधिकारी। लापरवाही बरतने पर इन अफसरों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।
1 जनवरी 2011 से पहले बने धर्मस्थलों को शिफ्ट करने का आदेश
डेमो
हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने प्रदेश सरकार को सख्त आदेश दिया था कि 1 जनवरी 2011 के बाद सड़कों के किनारे, गलियों में, हाईवे पर, चौराहों पर अतिक्रमण करके जहां भी धार्मिक स्थल बनाए गए हैं, उन सभी को तुरंत हटाया जाए।
अदालत ने 1 जनवरी 2011 से पहले बने धर्मस्थलों को शिफ्ट करने का आदेश दिया था। लखनऊ के पारा पुलिस स्टेशन के निकट दाउद खेड़ा के 19 नागरिकों की याचिका पर जस्टिस सुधीर अग्रवाल व जस्टिस राकेश श्रीवास्तव ने यह आदेश दिया था।
अदालत ने यह भी कहा था कि 10 जून, 2016 के बाद कोई भी धर्म स्थल बना तो संबंधित अफसर जिम्मेदार होंगे। धर्मस्थल चाहे उन्हें जिस नाम से पुकारा जाए या जिस भी धर्म, समुदाय, संप्रदाय, जाति, पंथ, वर्ग आदि के हों, इन्हें किसी भी कीमत पर बनने न दिया जाए।
हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने 10 जून 2016 को अवैध धार्मिक स्थलों पर आदेश देते समय इसे बड़ा मामला बताया था। जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस राकेश श्रीवास्तव की पीठ ने कहा कि धर्म, आस्था, समुदाय आदि के नाम पर अतिक्रमण का यह मामला बहुत बड़ा है और हर जगह फैला हुआ है।
यह जरूरी है कि प्रदेश सरकार के अधिकारियों को इस पर प्रभावी कार्रवाई के लिए कहा जाए। हमारी नजरों में जो लोग इस तरह की बाधा बनने वाले धर्मस्थलों का निर्माण करते हैं, इनकी देखभाल या प्रबंधन करते हैं और जो इनके खिलाफ कार्रवाई करने में असफल रहते हैं, उन सभी को इन गलतियों के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने की जरूरत है।
धार्मिक स्थल को सार्वजनिक सड़कों पर बनाने की अनुमति नहीं
11 साल से न्याय के लिए भटक रही है पीड़िता
- फोटो : Demo
कोर्ट ने यह भी कहा था...
1. नागरिकों को इसका मूल या कानूनी अधिकार नहीं है कि वे सार्वजनिक सड़कों या गलियों के किनारे अतिक्रमण करके निर्माण करें। यह गैर कानूनी है और ट्रैफिक ही नहीं, पैदल चलने वालों के सामने भी बाधा बनता है। सरकारी अधिकारी इस पर उदासीन नहीं बने रह सकते।
2. प्रदेश सरकार से कहा है कि वह एक कार्ययोजना बनाए और सुनिश्चित करे कि धार्मिक गतिविधियों की वजह से सार्वजनिक मार्गों का ट्रैफिक और नागरिकों का आवागमन प्रभावित न हो। ऐसी गतिविधियां वहीं हों जहां इनकी जगह निर्धारित की गई है या निजी जगहें हैं।
3. किसी भी तरह के धार्मिक स्थल को सार्वजनिक सड़कों, गलियों, हाईवे, पाथ-वे, साइड-वे आदि पर बनाने की अनुमति नहीं होगी।
वर्ष 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार को सरकारी जमीन पर बने अवैध धार्मिक स्थलों को चिह्नित कर उन्हें हटाने का निर्देश दिया था। तब सरकार ने सर्वे कराया था।
इसके अनुसार सूबे में 40 हजार धार्मिक स्थल ऐसे पाए गए थे जो सड़कों के किनारे, गलियों में, हाईवे या फिर चौराहे पर अवैध तरीके से बनाए गए थे। यह रिपोर्ट आने के बाद सरकार ने चुप्पी साध ली और धार्मिक स्थल नहीं हट पाए।