सूबे में चाहे बसपा की सरकार रही हो या सपा की,दागी अफसरों का दबदबा बरकरार रहा है। किसी जमाने में पूरे देश में अपनी काबिलियत का लोहा मनमाने वाले यूपी काडर के आईएएस अफसर अब घपलों-घोटालों और गलत कारगुजारियों से प्रशासनिक सेवा की साख गिरा रहे हैं।
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सरकार घोटालेबाजों पर कड़ी कार्रवाई करके ऐसा कोई संदेश भी देने को तैयार नहीं हैं जिससे उनमें डर पैदा हो सके। उल्टे किसी न किसी दबाव के चलते ऐसे अफसरों को बचाने की ही कोशिश की जाती है।
आईएएस प्रदीप शुक्ला बहाल हो गए। नई तैनाती भी पा गए। सरकार के रवैये पर सवाल उठ रहा है। सवाल इसलिए कि करोड़ों रुपये के एनआरएचएम घोटाले में जेल की हवा खाना क्या कोई अतिरिक्त योग्यता है?आखिर दागी को अहम पद दिया जाना क्या मजबूरी है?इससे क्या प्रशासनिक अमले में जो ईमानदार हैं उनमें गलत संदेश नहीं जाता?
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केवल प्रदीप शुक्ला ही क्यो?बड़ी लंबी फेहरिस्त है ऐसे अफसरों की। जो घपलों-घोटालों और अपनी कारगुजारियों के चलते चर्चा में रहे हैं। पर,उनपर सरकारों की नजरें इनायत ही रहीं। जहां तक प्रदीप शुक्ला का सवाल है तो उनकी गिनती मायावती सरकार के उन चुनिंदा अफसरों में होती थी जिनकी तूती बोलती थी।
एनआरएचएम घोटाले में नाम आने के बाद भी उनका रुतबा कम नहीं हुआ। 2012 में मायावती सरकार के जाने के बाद जब अखिलेश सरकार आई तब भी प्रदीप शुक्ला का डंका बजता रहा। अखिलेश सरकार में शुक्ला के खैरख्वाहों ने जेल जाकर उनकी मिजाजपुर्सी में कसर बाकी नहीं रखी।
यही नहीं जेल से छूटने के बाद शुक्ला को राजस्व परिषद में तैनाती भी दे दी गई। बखेड़ा खड़ा होने पर अगस्त 2012 में उन्हें निलंबित किया गया। उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की स्वीकृति देने में भी राज्य सरकार ने काफी समय लगाया। अब उन्हें बहालकर फिर से राजस्व परिषद में तैनाती दी गई है। शुक्ला ही नहीं,कई और अफसर हैं जिनके ऊपर दागी होने का ठप्पा लगने के बाद भी सरकार उनके ऊपर मेहरबान है।
तीन साल की सजा के बाद भी मिल गई कुर्सी
नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाले में पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव के साथ तीन साल की कैद की सजा पाने वाले आईएएस राजीव कुमार जमानत पर बाहर आ गए। गौरतलब है कि नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाला पिछली मुलायम सरकार में हुआ था।
सजा होने के बाद अखिलेश सरकार ने उन्हें प्रमुख सचिव नियुक्ति एवं कार्मिक पद से हटाया जरूर लेकिन जमानत मिलने के बाद उन्हें फिर से उसी कुर्सी पर बैठा दिया गया। सपा सरकार बनने के बाद बहुत से आईएएस अफसर इधर से उधर हुए पर राजीव कुमार नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग में ही डटे हैं और वही अफसरों की ट्रांसफर-पोस्टिंग की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
सदाकांत :घोटाले में आरोपी बने,पर रुतबा बरकरार
वरिष्ठ आईएएस सदाकांत इस समय प्रमुख सचिव आवास के पद पर तैनात हैं। केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव के पद पर तैनाती के दौरान लेह-लद्दाख में 200 करोड़ रुपये का घोटाला उजागर हुआ।
सीबीआई ने 2010 में मामले में एफआईआर दर्ज की और उसमें सदाकांत को भी आरोपी बनाया। आखिरकार केंद्र सरकार ने सदाकांत की प्रतिनियुक्ति रद्द करके उन्हें वापस यूपी काडर में भेज दिया। यहां उन्हें समाज कल्याण विभाग और सूचना एवं जनसंपर्क जैसे अहम विभागों की जिम्मेदारी भी दी जा चुकी है।
भर्ती घोटाले के दाग भी न बन सके रुतबे में रोड़ा
लखनऊ के मंडलायुक्त और अवस्थापना एवं औद्योगिक विकास विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे आईएएस महेश गुप्ता का नाम 1998 में सूचना विभाग में कर्मचारियों की भर्ती में हुए घोटाले में आया। सीबीआई ने मामले की जांच के दौरान 2008 में ही महेश गुप्ता सहित अन्य अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की।
मायाराज में विवादित आबकारी नीति बनाने में महेश गुप्ता का ही योगदान माना जाता है। इस नीति के कारण ही पोंटी चड्ढा ने पूरे प्रदेश के शराब कारोबार पर एकछत्र राज कायम कर लिया था। अखिलेश सरकार आई तो उम्मीद की जा रही थी कि महेश गुप्ता को साइडलाइन किया जाएगा लेकिन उन्हें और अहम जिम्मेदारियां दे दी गईं।
लोकायुक्त जांच के दायरे में आए,पर कार्रवाई से बच निकले
मोहिंदर सिंह 1978 बैच के रिटायर आईएएस हैं। बसपा सरकार में उनकी तूती बोलती थी। सपा सरकार की भी उनके ऊपर खूब कृपा बरसी। मोहिंदर सिंह के नोएडा अथॉरिटी में चेयरमैन रहने के बाद ही बहुचर्चित फार्म हाउस आवंटन घोटाला हुआ।
लोकायुक्त की लंबी जांच चली। सरकार ने उन्हें रिटायर होने का मौका दिया। लोकायुक्त की जांच के दायरे में आने के बाद भी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई और वह बच निकले।
के.धनलक्ष्मीः यूपीएसआईडीसी घोटाले का दाग यूपीएसआईडीसी घोटाले में आरोपी आईएएस अफसर के. धनलक्ष्मी को अखिलेश सरकार में सुल्तानपुर के डीएम सहित कई अन्य अहम पदों पर तैनाती मिली।
कोर्ट के सख्त रुख के बाद ही नोएडा अथॉरिटी से हटाए गए
राकेश बहादुर पिछली सपा सरकार में नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन पद पर तैनात थे। 2006 में नोएडा में होटलों के लिए प्लॉट आवंटन हुए। इनमें घोटाले की बात सामने आने पर बसपा सरकार ने 2007 में इन आवंटनों को रद्द कर दिया।
2009 में राकेश बहादुर को मायावती सरकार ने निलंबित कर दिया। 2010 में प्रवर्तन निदेशालय ने राकेश बहादुर के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया। पर अखिलेश सरकार बनने के फौरन बाद ही राकेश बहादुर नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन पद पर बिठा दिए गए।
इस पर कोर्ट ने भी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। इसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री ने उन्हें अपना प्रमुख सचिव नियुक्त कर दिया। कुछ समय पूर्व उन्हें मुख्यमंत्री सचिवालय से हटा दिया गया था। अब उन्हें परिवहन निगम का चेयरमैन बनाया गया है।
400 करोड़ के घोटाले में निलंबित हुए,सरकार बदलते ही दिन बहुरे
मुलायम सरकार के दौरान नोएडा के सीईओ पद की जिम्मेदारी संभालने वाले संजीव सरन अखिलेश सरकार बनते ही वापस उसी पद पर पहुंच गए। 2006 में नोएडा में हुए 4000 करोड़ से अधिक के कथित भूमि घोटाले में बसपा सरकार ने इन्हें भी निलंबित कर दिया था।
इनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई। मामले की जांच ईओडब्यू मेरठ को सौंपी गई। अदालत के आदेश पर उन्हें नोएडा से हटाया गया तो शासन में कई और अहम विभागों की जिम्मेदारी सौंप दी गई। संजीव सरन इस समय प्रमुख सचिव वन के पद पर तैनात हैं।
सत्ता समीकरण साधने के महारथी ने सबको नचाया
यादव सिंह वह नाम है जो अपने हिसाब से समीकरण बनाने का महारथी माना जाता है। बसपा सरकार हो या फिर सपा की,उसने अपने हिसाब से अपनी तैनाती कराई।
बसपा सरकार में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में सभी महत्वपूर्ण कामों पर एकाधिकार रखने वाले यादव सिंह पर सपा सरकार की नजर भले ही टेढ़ी हुई हो,लेकिन महज 16 माह में ही सीधी भी हो गई।
सपा के एक शीर्ष नेता के इशारे पर यादव सिंह 17वें महीने बहाल कर दिए गए और पहले नोएडा फिर ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस-वे जैसे तीन महत्वपूर्ण अथॉरिटी का मुख्य अभियंता बना दिया गया।
एनसीआर क्षेत्र की ये तीनों सबसे प्राइम पोस्टिंग मानी जाती हैं। यादव सिंह दिसंबर 2011 में नोएडा अथॉरिटी के 954 करोड़ रुपये का काम केवल 10 दिन के अंदर ही चहेती कंपनियों को बांटने के बाद ज्यादा चर्चा में आए।
प्रदेश में सत्ता की बागडोर मार्च 2012 में अखिलेश यादव के हाथों में आई। इसके तीन महीने बाद ही जून 2012 में यादव सिंह को निलंबित करते हुए रिपोर्ट दर्ज कराई गई। सपा सरकार उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी कराया।
पुलिस जांच कर पाती इससे पहले इसे सीबीसीआईडी के सुपुर्द कर दिया गया। यादव सिंह को निलंबन के 17 माह बाद यानी नवंबर 2013 में बहाल किया गया। यह बहाली इतनी गुपचुप तरीके से हुई कि तत्कालीन मुख्य सचिव जावेद उस्मानी तक को इसकी भनक नहीं लग सकी थी।
यादव सिंह पर लगभग 1000 करोड़ के घोटाले का आरोप है। यादव सिंह पिछले साल उस वक्त चर्चा में आया था जब आयकर ने उसके ठिकानों पर छापा मारकर अरबों की बेहिसाब संपत्ति का खुलासा किया था।
दबाव पड़ने के बाद सरकार ने यादव सिंह को निलंबित करके जांच के लिए एक सदस्यीय न्यायिक आयोग गठित किया है।
400 करोड़ के घोटाले के मुख्य आरोपी,ठाठ से कर रहे नौकरी
गाजियाबाद के बहुचर्चित ट्रॉनिका सिटी में भू-उपयोग बदलकर 400 करोड़ रुपये के घपले के मुख्य आरोपी उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम (यूपीएसआईडीसी) के मुख्य अभियंता अरुण मिश्र को सपा-बसपा राज में मिला सियासी संरक्षण जगजाहिर है।
सीबीआई का शिकंजा कसा,गिरफ्तार भी हुए पर जेल से बाहर आते ही फिर मुख्य अभियंता की कुर्सी पर काबिज हो गए। कार्रवाई के नाम पर अब तक प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) दिल्ली स्थित उनका सौ करोड़ रुपये का बंगला जब्त किया है।
अरुण मिश्र अपनी कारस्तानियों को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहे। सत्ताधारी दल से उनकी नजदीकी हमेशा चर्चा में रही। उनका नाम 2005-06 के 400 करोड़ रुपये के ट्रॉनिका सिटी घोटाले में आया। उस समय मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। अरुण मिश्र का दबदबा आज भी कायम है और वह ठाठ से नौकरी कर रहे हैं।