पावर ऑफिसर्स एसोसिएशन से जुड़े अभियंताओं व अन्य कार्मिकों की शुक्रवार को बैठक होगी। इसमें निजीकरण के मुद्दे पर अगली रणनीति तैयार की जाएगी। एसोसिएशन की फील्ड हॉस्टल में बृहस्पतिवार को हुई बैठक में अब तक चली गतिविधियों की समीक्षा की गई। ऊर्जा मंत्री एके शर्मा के विधानसभा में दिए गए बयान पर चिंता व्यक्त की गई। दलित और पिछड़े वर्ग के अभियंताओं को लक्ष्य बनाकर खराब स्थिति वाले क्षेत्र में तैनात किए जाने पर भी विरोध जताया गया। तय किया गया कि शुक्रवार को पूरे प्रदेश के एसोसिएशन से जुड़े पदाधिकारी व सदस्य ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़ेंगे। इसमें आंदोलन की अगली रणनीति तैयार की जाएगी। बैठक में एसोसिएशन के कार्यवाहक अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा, अनिल कुमार, आरपी केन, बिंदा प्रसाद, सुशील कुमार वर्मा, अजय कुमार, आदि मौजूद रहे।
निजीकरण के बहाने निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने का प्रयास
पूर्वांचल और दक्षिणांचल को सस्ती बिजली खरीद का है समझौता
प्रदेश में दो साल के लिए तय की गई पावर परचेज एग्रीमेंट (पीपीए ) में पूर्वांचल और दक्षिणांचल की खरीद दर सबसे सस्ती रखी गई है। ऐसे में इन दोनों निगमों को तोड़कर प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत जिन पांच कंपनियों को टेंडर मिलेगा, उन्हें सर्वाधिक फायदा होगा। नए मसौदे में लिखा गया है कि पहले से तय पीपीए दो साल तक नई कंपनियों पर लागू होगा। नियामक आयोग की ओर से वर्ष 2024 -25 के लिए सभी विद्युत वितरण निगमों के लिए पावर परचेज एग्रीमेंट (पीपीए) तय किया गया है। इसी दर पर निगम बिजली खरीद करेंगे।
बल्क सप्लाई टैरिफ (बीएसटी) की दरों में पूर्वांचल को 5.21 रुपया प्रति यूनिट की दर से 17652 करोड़ की बिजली खरीदेगा। इसी तरह दक्षिणांचल 5.45 रुपया प्रति यूनिट की दर से 15910 करोड, पश्चिमांचल 5.65 प्रति यूनिट की दर से 24357 करोड की, मध्यांचल 5.40 रुपये प्रति यूनिट की दर से 16435 करोड की बिजली खरीदेगा। कानपुर की केस्को 6.51 रुपये प्रति यूनिट की दर से 2959 करोड की बिजली खरीदेगा। उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा का आरोप है कि कॉरपोरेशन प्रबंधन और एंपावर्ड कमेटी ने पीपीपी मॉडल के प्रस्ताव में निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने का प्रयास किया है। मसौदे में साफ लिखा है कि पीपीपी मॉडल के तहत बनने वाली पांच बिजली कंपनियों के लिए पावर परचेज एग्रीमेंट (पीपीए ) का अलॉटमेंट दो साल के लिए जस का तस रहेगा। ऐसे में ये पीपीपी मॉडल की पांचों कंपनियां जहां 9061 करोड़ का अनुदान पाएंगी वहीं खरीद दर भी उनकी सस्ती रहेगी। उन्होंने मांग की कि पीपीपी मॉडल का प्रस्ताव निरस्त किया जाए।