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UP: प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ने जा रहा है असर, स्मार्ट मीटर का खर्च जुड़ते ही महंगी होगी बिजली

Mon, 05 Jan 2026 09:19 PM IST
रोहित मिश्र अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ

सार

Expensive electricity in UP: भारत सरकार द्वारा वर्ष 2023 में स्पष्ट आदेश दिया गया है कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर की किसी भी प्रकार की लागत प्रदेश के उपभोक्ताओं पर नहीं डाली जाएगी। 
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यूपी में महंगी हो सकती है बिजली। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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पावर कार्पोरेशन ने वर्ष 20265-27 के वार्षिक राजस्व आवश्यकता प्रस्ताव में स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने का खर्च करीब चार हजार करोड़ रुपये बताया है। यह खर्च टैरिफ में जोड़ा गया तो पांच से छह फीसदी तक बिजली महंगी हो जाएगी। इसके अलावा अन्य खर्चे अलग से जुड़ेंगे। इसकी भनक लगते ही राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने विरोध शुरू कर दिया है।

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पावर कार्पोरेशन ने बिजली कंपनियों की ओर से वार्षिक राजस्व आवश्यकता (एआरआर)का प्रस्ताव दाखिल कर दिया है। इस प्रस्ताव में स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने का खर्च मार्च 2026 तक करीब 38 सौ से चार हजार करोड़ रुपये बताया गया है। अकेले स्मार्ट प्रीपेड मीटर का खर्च टैरिफ में जुड गया तो पांच से छह फीसदी तक बिजली महंगी हो सकती है। इसके अलावा अन्य खर्चे अलग से जुड़ेने तय है। क्योंकि कार्पोरेशन ने एआरआर में कई तरह के खर्च और घाटे को जोड़कर आकलन किया है। 

खास बात यह है कि भारत सरकार द्वारा वर्ष 2023 में स्पष्ट आदेश दिया गया है कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर की किसी भी प्रकार की लागत प्रदेश के उपभोक्ताओं पर नहीं डाली जाएगी। ऊर्जा मंत्री द्वारा विधानसभा में यह बयान दिया गया है कि मौजूदा बिजली मीटर हटाकर लगाए जाने वाले स्मार्ट प्रीपेड मीटर की कोई भी लागत सीधे उपभोक्ताओं से नहीं ली जाएगी। इसके बाद भी एआरआर में स्मार्ट प्रीपेड मीटर का एक वर्ष का खर्च करीब 38 सौ से चार हजार करोड़ रुपये दिखाया गया है। 
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इसकी जानकारी मिलने पर राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने विरोध जताया है। उन्होंने कहा कि पावर कॉरपोरेशन प्रति स्मार्ट प्रीपेड मीटर प्रति माह ओपेक्स मॉडल में उपभोक्ताओं पर भार डालने की कोशिश कर रहा है। इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। एआरआर में किया गया प्रस्ताव भारत सरकार के आदेशों का उलंघन है। उन्होंने कहा कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर परियोजना के अंतर्गत लगभग 18,885 करोड़ के अनुमोदित टेंडर को बढ़ाकर लगभग 27,342 करोड़ में कंपनियों को दिया गया है। इस बढ़ी हुई लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डालने का प्रयास किया जा रहा है, जिसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

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