यूपी में चुनावी राजनीति में पास होने के लिए कांग्रेस को कड़ी परीक्षा से गुजरना होगा। सिर्फ आंदोलन करने या नेतृत्व बदलने से काम नहीं चलेगा, बल्कि जिला व शहर स्तर पर भी मजबूत संगठन तैयार करना होगा। लोकसभा चुनाव से पहले इस पर फोकस करने से ही किसी भी तरह का जातिगत समीकरण पार्टी के लिए मददगार साबित हो सकता है।
वर्तमान में कांग्रेस यूपी में अपने संसदीय इतिहास के सबसे कमजोर दौर में है। विधान परिषद से वह साफ हो चुकी है, जबकि विधानसभा में पार्टी के मात्र दो सदस्य हैं। इस स्थिति से उबरने के लिए जहां राष्ट्रीय स्तर पर नए नेतृत्व को कमान सौंपने की तैयारी है, वहीं प्रदेश में भी नए नेतृत्व को कमान सौंपी गई है। इसमें दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम समीकरणों को साधने की भरपूर रणनीति तैयार की गई है।
यूपी की राजनीति के जानकार व दिल्ली विवि के शिक्षक डॉ. लक्ष्मण यादव कहते हैं कि राजनीति में पैर जमाने के लिए संघर्ष और हर लिहाज से क्षमतावान नेतृत्व आवश्यक है। लेकिन यह काफी नहीं होता। प्रदेश की राजनीति में वही सफल होता है, जिसका जमीन पर संगठन हो और जो आम लोगों से मिल रहे समर्थन को वोट में बदल सके। प्राय: देखने में आता है कि बूथ स्तर पर संगठन न होने से प्रतिद्वंद्वी स्थानीय नेता जातिगत समीकरण दूसरी ओर मोड़ने में कामयाब हो जाते हैं।
जेएनयू के सेवानिवृत्त प्रो. आनंद कुमार कहते हैं कि राजनीति में मतदाता सबसे पहले यह देखता है कि भविष्य में कोई मुसीबत आने पर सबसे पहले उसके साथ किस पार्टी का नेता खड़ा हो सकता है। इस तरह की मुसीबत में सबसे ज्यादा पुलिस थानों और तहसीलों के मामले होते हैं। जो पार्टी स्थानीय स्तर पर ऐसे मददगार कार्यकर्ताओं को तैयार कर पाती है, वही चुनाव में निखर कर सामने आती है। कांग्रेस को इस बात को ध्यान में रखकर अपनी दूरगामी रणनीति तैयार करनी होगी। ताकि, तात्कालिक विफलताओं से निराश हुए बिना आगे बढ़ा जा सके।