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UP Chunav Result: दलितों का रुझान रहा निर्णायक... जितने घाटे में बसपा-BJP, ठीक उतने ही फायदे में सपा-कांग्रेस

Sun, 09 Jun 2024 08:08 AM IST
शाहरुख खान अजित बिसारिया, अमर उजाला, लखनऊ

सार

दलितों का रुझान निर्णायक रहा। जितने घाटे में बसपा और भाजपा, ठीक उतने ही फायदे में सपा और कांग्रेस रहीं। संविधान के मुद्दे के अलावा आम जिंदगी की दुश्वारियों ने भी अहम रोल निभाया।
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UP Chunav Result 2024 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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लोकसभा चुनाव में काफी हद तक दलित मतदाताओं का रुझान निर्णायक रहा। उत्तर प्रदेश में जितनी बसपा और भाजपा घटी, ठीक उतने ही फायदे में सपा और कांग्रेस रहीं। इसके पीछे दलित मतदाताओं का बड़ा हाथ माना जा रहा है। 
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जनसभाओं में राहुल गांधी के संविधान की किताब दिखाने और 69 हजार शिक्षक भर्ती में ओबीसी आरक्षण के मामले ने जहां मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाला, वहीं आम जिंदगी की दुश्वारियों ने भी अहम रोल निभाया।

इस चुनाव में दलितों का वोटिंग पैटर्न क्या रहा, इस सवाल पर फिलहाल विशेषज्ञों का कहना है कि मतदान बाद का अध्ययन अभी चल रहा है और नतीजे आने में वक्त लगेगा। लेकिन, इतना जरूर कहा जा सकता है कि दलित मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा विकल्प की तलाश में था और अलग-अलग राज्यों में उसका व्यवहार अलग-अलग रहा। 
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यूपी में उसका झुकाव इंडिया गठबंधन की ओर रहा। दलित मतदाताओं का सपा प्रत्याशियों की ओर जाने में कांग्रेस का साथ होना भी अहम फैक्टर माना जा रहा है। सीएसडीएस के अनुसार, देश में वर्ष 2014 के चुनाव में भाजपा को 24 प्रतिशत और 2019 में 34 प्रतिशत दलित वोट भाजपा को मिले। 
 

अगर यूपी में देखें तो वर्ष 2012 में 5 प्रतिशत जाटव वोट और 11 प्रतिशत नॉन जाटव वोट भाजपा को मिले। वहीं, वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में 21 प्रतिशत जाटव वोट और 41 प्रतिशत नॉन जाटव वोट भाजपा को मिले।

विकल्प के रूप में नहीं    खड़ी हो सकी बसपा
  • लखनऊ विवि के राजनीति शास्त्र के प्रो. संजय गुप्ता अपनी अध्ययन रिपोर्ट के हवाले से कहते हैं, दलित मतदाताओं का बसपा और उसकी सुप्रीमो मायावती से मोहभंग हुआ है। इसकी वजह उनका सत्ता के विकल्प के रूप में खड़ा नहीं हो पाना है। वे कहते हैं, इसके रणनीतिक कारणों के पीछे तो मैं नहीं जाना चाहता, लेकिन इस बार के राष्ट्रीय चुनाव में आम दलित मतदाताओं ने कांग्रेस और उसकी वजह से सपा को विकल्प के रूप में देखा। यूपी में दलित मतदाता 21 प्रतिशत हैं और बसपा का वोट प्रतिशत 19.43 प्रतिशत से गिरकर 9.39 प्रतिशत पर पहुंच गया। यह दिखाता है कि नॉन जाटव वोटर तो पहले ही उससे दूर हो गए थे, इस चुनाव से जाटव मतदाताओं ने भी विकल्प तलाशने शुरू कर दिए हैं।

  • वर्ष 2019 में यूपी की 17 सुरक्षित सीटों में से 15 भाजपा को मिली थीं, लेकिन इस बार 8 सीटें ही उसकी झोली में आईं। सपा को 7 सीटें, जबकि आजाद समाज पार्टी और कांग्रेस को 1-1 सीट मिली। पिछले चुनाव में दो आरक्षित सीटें बसपा को मिली थीं, लेकिन इस बार वह शून्य पर सिमट गई। बसपा ने इस बार अपने मतदाताओं को मत प्रतिशत बढ़ाने का संदेश दिया था, लेकिन पार्टी इसमें फ्लॉप साबित हुई। दूसरी ओर सपा ने 6 जाटव उम्मीदवार मैदान में उतारे। इनमें से दो को तो उसने सामान्य सीटों पर उतारे। इससे सपा को लेकर दलित मतदाताओं में जो शंकाएं थीं, उन्हें दूर करने में मदद मिली। 

क्या रहीं वजहें...
शुरू से ही विकल्पों की तलाश में था दलित समाज

समकालीन राजनीतिक मामलों के जानकार और जेएनयू के सेवानिवृत्त प्रो. रवि श्रीवास्तव कहते हैं,  इंडिया गठबंधन की ओर से उठाए गए बेरोजगारी और मुद्रास्फीति जैसे मुद्दे प्रभावी रहे। भाजपा की राहत की नीतियां काफी हद तक निष्प्रभावी रहीं। ऊपर से दलित समाज में संविधान बदलने का भय था। बसपा की लोकप्रियता में कमी आने और उसके सत्ता में आने की कोई उम्मीद नहीं होने से दलित समाज का एक बड़ा वर्ग विकल्पों की तलाश में था।

यूपी, महाराष्ट्र और कुछ हद तक कर्नाटक व बिहार में यह वर्ग कांग्रेस और कांग्रेस की वजह से उसके सहयोगियों की ओर उन्मुख हुआ। कांग्रेस और उसके सहयोगियों का वोट बढ़ने का संभवतः ये मुख्य कारण बना। संभवतः मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि अभी पोस्ट पोल एनालिसिस (मतदान बाद का विश्लेषण) प्रक्रिया में है। दलितों के नया स्टैंड लेने के पीछे संविधान एक कारण था, पर अन्य कारणों का विश्लेषण होना अभी बाकी है।

निर्णायक साबित हुए दलित मतदाता
सेंटर फॉर ऑब्जेक्टिव रिसर्च एंड डवलपमेंट (सीओआरडी) के डायरेक्टर अतहर हुसैन कहते हैं, यूपी में इस बार के चुनाव में दलित मतदाता निर्णायक साबित हुए। भाजपा के वोटबैंक माने जाने वाले पासी मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा इस बार शिफ्ट होकर इंडिया गठबंधन की ओर चला गया।

जाटव जाति के मतदाताओं का 60 फीसदी हिस्सा अभी भी बसपा के साथ रहा, लेकिन उनके 30 फीसदी वोट सपा-कांग्रेस लेने में सफल रहीं। महज 10 फीसदी वोट ही भाजपा की ओर गया। लखनऊ जैसे लोकसभा क्षेत्र में सपा प्रत्याशी को मिले वोट दिखाते हैं कि इंडिया गठबंधन को इस बार वाल्मीकि और धोबी मतदाताओं का भी एक हिस्सा मिला। इसकी वजह है कि मौजूदा व्यवस्था के प्रति उनमें संतुष्टि का भाव नहीं है और दलितों का एक बड़ा हिस्सा परिवर्तन चाहता है।

देश में दलित मतदाताओं का नहीं दिखा स्पष्ट पैटर्न
सामाजिक-राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ प्रो. आनंद कुमार कहते हैं, देश में दलित मतदाताओं का कोई एक समान वोटिंग पैटर्न देखने को नहीं मिला। यूपी में भी 'दलित वोट' और बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार को मिले वोट के बीच कोई सीधा संबंध दिखाई नहीं पड़ा। यह गठबंधन की ओर भी शिफ्ट होते हुए दिखा। मध्यप्रदेश और बिहार में दलित समुदायों का भाजपा की तरफ झुकाव था, जबकि महाराष्ट्र और राजस्थान में अलग व्यवहार रहा।

भूमि पर मालिकाना हक और रोजगार दलितों के बड़े मुद्दे
अब तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, यूपी में अनुसूचित जाति की जनसंख्या 20.70 प्रतिशत है। इनके बीच बेरोजगारी बड़ी समस्या है। अन्य वर्गों के मुकाबले अनुसूचित जाति में भूमिहीन ज्यादा हैं। भूमिहीनों को भूमि दिए जाने की उनकी मांग बहुत पुरानी है। जमींदारी उन्मूलन कानून लागू होने पर भी एससी आबादी के एक बड़े हिस्से को भूमि के पट्टे नहीं मिल सके। अनुसूचित जाति में गरीबी बड़ी समस्या है, इसलिए सामाजिक सुरक्षा की बलवती आकांक्षा भी उनमें है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि दलित आबादी अवसरों में वृद्धि चाहती है। इसका भी असर नजर आया।  

एक दल से नहीं बंधे, समुदाय के तौर पर सौदेबाजी के लिए तैयार
सामाजिक-आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. अरशद आलम कहते हैं कि आजादी के बाद दलितों की आर्थिक स्थिति में जो बदलाव आया है, उसमें आरक्षण का बड़ा योगदान है। यही वजह है कि उन्हें इस बार भाजपा से आरक्षण का खतरा महसूस हुआ, तो वे सपा-कांग्रेस की ओर शिफ्ट हो गए। जबकि, सपा के साथ दलितों का रिश्ता कभी स्वाभाविक नहीं रहा। 

 

यही वजह है कि पिछले चुनाव में बसपा के साथ गठबंधन होने के बावजूद दलित वोट सपा की ओर नहीं गया। दलित वोटों को अपने साथ रखने के लिए जहां भाजपा को इन चुनौतियों से जूझना होगा, वहीं उनके सामाजिक-आर्थिक बदलाव के लिए ठोस प्रयास करने होंगे। मुफ्त राशन, आवास और शौचालय अब उन्हें नाकाफी लगने लगे हैं। वे आर्थिक उन्नयन चाहते हैं।
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इस चुनाव से साफ हो गया है कि दलित किसी एक दल के साथ नहीं बंधा है। उनमें सौदेबाजी की प्रवृत्ति बढ़ रही है। अब जो दल उनकी उम्मीदों पर खरा उतरेगा, उधर बढ़ने में उन्हें दिक्कत नहीं। भविष्य में कांग्रेस-सपा को भी दलितों का साथ मिलने का यही आधार होगा।
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