ज्ञानवापी प्रकरण में इलाहाबाद हाईकोर्ट के कार्बन डेटिंग के लिए आधुनिक तकनीक तलाश करने के आदेश पर मंथन शुरू हो गया है। कार्बन डेटिंग और पुरातत्व विशेषज्ञ का मानना है कि शिवलिंग के लिए यह प्रक्रिया आसान नहीं होगी। इसके लिए पुराने तरीक की जगह नई तकनीक व वैज्ञानिक सलाह से काम करना होगा। रिसर्च प्रोजेक्ट तैयार कर विशेषज्ञों की निगरानी में आयु की गणना की जाए। हालांकि कुछ अत्याधुनिक तकनीक से बिना शिवलिंग संरचना को नुकसान पहुंचाये ही उम्र का पता लगाया जा सकता है।
बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (बीएसआईपी) लखनऊ के पूर्व वरिष्ठ पुराविज्ञानी और कार्बन डेटिंग लैब के पूर्व प्रभारी डॉ. सीएम नौटियाल ने बताया कि जिस शिवलिंग की आयु निकालनी है। उसके लिए छोटा ही सही लेकिन नमूना तो लेना ही होगा। इस दौरान नमूना नष्ट हो जाएगा, लेकिन शिवलिंग के अखंडित रहने पर भी संशय हैं ?
बिना नमूना भी हो सकती है जांच
डॉ. नौटियाल का कहना है कि कॉस्मिक किरणों में मिलने वाले म्यूऑन कणों की वर्षा करके आयु और पत्थर में तत्वों का पता लगाया जा सकता है। इसमें नमूने की जरूरत नहीं होती है। लेकिन, म्यूऑन कणों का श्रोत ज्ञानवापी के अंदर कै से पहुंचे? उपयोग के बाद उत्सर्जित कणों की पहचान कैसे होगी? क्या शिवलिंग के पत्थर के सभी अंश एक ही समय के हैं? शुरुआती अवस्था में मौजूद यह तकनीक अभी अमेरिका में खास प्रोजेक्ट में प्रयोग की जाती है। इसके अलावा अमेरिका में एक उपकरण विकसित किया जा रहा है, जिससे प्रयोगशाला में बिना नमूना लाए ही साइट पर डेट निकाली जा सकती है, लेकिन इसमें भी नमूना लेना पड़ेगा।
50 हजार साल के लिए उपयोगी है कार्बन डेटिंग
डॉ. नौटियाल का कहना है कि संभव है कि पत्थर की आयु लाखों, करोड़ों वर्ष निकले। रेडियोकार्बन से केवल 50 हजार साल तक की आयु ही पता चल सकती है। इससे यही कहा जा सकेगा कि यह 50 हजार साल से अधिक पुराना है। हालांकि पत्थर और चट्टानें तो पुरानी होती ही हैं।
जीपीआर तकनीक का भी हो उपयोग
शिवलिंग की आयु अधिक निकलने से वह पुराना सिद्ध नहीं होगा? पत्थर से शिवलिंग कब बनाया गया? उसकी संरचना क्या है? इसके लिए ग्राउंड पेनीट्रेशन रडार (जीपीआर) तकनीक का उपयोग किया जाए। वैसे तो इसके लिए सपाट जगह और बड़ी-बड़ी मशीनें चाहिए। खास प्रोजेक्ट के लिए ड्रोन पर भी उपकरण लगाकर उपयोग किया जाता है। इससे शिवलिंग के नीचे की संरचना और गहराई पता चलेगी। नासा द्वारा मंगल पर भेजे गए रोवर में भी शर्लक तकनीक का उपयोग हो रहा है। रामन विधि पर आधारित इस स्पेक्ट्रोमीटर से खनिजों और ऑर्गेनिक कंपाउंड की पहचान की जाती है। इससे चंद्रमा पर पत्थर में मौजूद तत्व का पता लगाया जाता है। इससे भी आयु के अनुमान के साक्ष्य मिलते हैं।
200 मिलीग्राम से भी कम चाहिए नमूना
डॉ. नौटियान ने बताया कि इस प्रोजेक्ट को तैयार करने के लिए पुरातत्वविद और वैज्ञानिक साथ बैठें और आपसी सहमति से अंतिम रूप दें। यहां एक से अधिक तकनीक का उपयोग करना पड़ सकता है। यह संवेदनशील मुद्दा है और शिवलिंग को क्षति भी नहीं पहुंचनी चाहिए। एक्सीलरेटर मास स्पेक्ट्रोमीटर (एएमएस) विधि में केवल 200 मिलीग्राम से भी कम का ही नमूना चाहिए।