मायावती के साथ आकाश आनंद।
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बसपा सुप्रीमो ने अपने भाई आनंद कुमार और भतीजे आकाश आनंद को पार्टी में ज्यादा तवज्जो देनी शुरू कर दी। उन्होंने आनंद को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जबकि आकाश को नेशनल कोआर्डिनेटर बना दिया। जिन ब्राह्मण और दलित नेताओं की वजह से बसपा ने सत्ता का स्वाद चखा था, उन्होंने दूसरे दलों का दामन थाम लिया या वे सक्रिय राजनीति से दूर हो गए। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा और उनके परिवार को ब्राह्मणों को संगठित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई, जो असफल साबित हुई।
भाजपा की बी टीम का आरोप
बसपा की कमजोरी का फायदा बाकी विपक्ष ने उठाया और बसपा को भाजपा की बी टीम बताने लगे। लगातार चुनावों में कमजोर और गुमनाम प्रत्याशियों को उतारना, अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर सपा और कांग्रेस के मुकाबले अल्पसंख्यकों को टिकट देने की बसपा की रणनीति ने भले ही उसे दोबारा मजबूत नहीं किया, लेकिन इससे विपक्ष के आरोपों को बल मिलता गया।
बसपा का सबसे ज्यादा नुकसान वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में हुआ जिसमें उसके तमाम नेता भाजपा में चले गए। इनमें से अधिकतर बसपा सुप्रीमो मायावती पर टिकट के बदले करोड़ों रुपये मांगने का आरोप लगाकर भाजपा के पाले में गए। इन आरोपों से बसपा कभी उबर नहीं सकी। बाद में हुए चुनावों में भी पार्टी पर इस तरह के आरोप टिकट गंवाने वाले प्रत्याशी लगाते रहे।