वजह अतीत की घटनाओं के सबक हों या कार्यकर्ताओं को बार-बार जनता के बीच भेजकर मोदी सरकार के कामकाज को चर्चा में लाना, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा यूपी के नेताओं को व्यस्त रखने की रणनीति के पीछे कुछ न कुछ तो जरूर है। जुलाई में महासंपर्क अभियान समाप्त हो रहा है।
आला कमान ने अब अगस्त से सितंबर तक सभी को फिर नए अभियान में जुटाने की तैयारी कर ली है। महासंपर्क अभियान के बाद अब उसने प्रशिक्षण के महाअभियान का फैसला किया है।
इसकी शुरुआत पहली अगस्त से बरेली में शिविर के साथ हो रही है। यह अभियान सितंबर तक चलेगा। इसके बाद संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। साथ ही प्रदेश में पंचायत चुनाव के नाते भी पार्टी नेता व्यस्त रहेंगे।
ऐसा लगता है कि भाजपा के रणनीतिकार नेताओं और कार्यकर्ताओं को खाली नहीं बैठने देना चाहते। इसके पीछे रणनीतिकारों का अपना निष्कर्ष है। वे यह मान रहे हैं कि पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को खाली छोड़ा गया तो उनके बीच खींचतान और गुटबाजी बढ़ सकती है।
खासतौर से उत्तर प्रदेश में इसका खामियाजा विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है। इसलिए शीर्ष नेतृत्व एक के बाद एक कार्यक्रम घोषित कर रहा है। रणनीतिकारों का मानना है कि नेता व्यस्त रहेंगे तो दूसरी बातों के लिए उन्हें वक्त ही नहीं मिलेगा।
साथ ही पार्टी को लेकर अन्य चर्चाओं के बजाय सिर्फ कार्यक्रमों की चर्चा होगी। गत नवंबर से अब तक अभियानों व कार्यक्रमों की लगातार घोषणा से यह बात साबित भी होती है।