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यूपी भाजपाइयों पर लागू होगा 'न सोएंगे न सोने देंगे फॉर्मूला'

Thu, 16 Jul 2015 09:14 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला,लखनऊ
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वजह अतीत की घटनाओं के सबक हों या कार्यकर्ताओं को बार-बार जनता के बीच भेजकर मोदी सरकार के कामकाज को चर्चा में लाना, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा यूपी के नेताओं को व्यस्त रखने की रणनीति के पीछे कुछ न कुछ तो जरूर है। जुलाई में महासंपर्क अभियान समाप्त हो रहा है।
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आला कमान ने अब अगस्त से सितंबर तक सभी को फिर नए अभियान में जुटाने की तैयारी कर ली है। महासंपर्क अभियान के बाद अब उसने प्रशिक्षण के महाअभियान का फैसला किया है।

इसकी शुरुआत पहली अगस्त से बरेली में शिविर के साथ हो रही है। यह अभियान सितंबर तक चलेगा। इसके बाद संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। साथ ही प्रदेश में पंचायत चुनाव के नाते भी पार्टी नेता व्यस्त रहेंगे।
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ऐसा लगता है कि भाजपा के रणनीतिकार नेताओं और कार्यकर्ताओं को खाली नहीं बैठने देना चाहते। इसके पीछे रणनीतिकारों का अपना निष्कर्ष है। वे यह मान रहे हैं कि पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को खाली छोड़ा गया तो उनके बीच खींचतान और गुटबाजी बढ़ सकती है।

खासतौर से उत्तर प्रदेश में इसका खामियाजा विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है। इसलिए शीर्ष नेतृत्व एक के बाद एक कार्यक्रम घोषित कर रहा है। रणनीतिकारों का मानना है कि नेता व्यस्त रहेंगे तो दूसरी बातों के लिए उन्हें वक्त ही नहीं मिलेगा।

साथ ही पार्टी को लेकर अन्य चर्चाओं के बजाय सिर्फ कार्यक्रमों की चर्चा होगी। गत नवंबर से अब तक अभियानों व कार्यक्रमों की लगातार घोषणा से यह बात साबित भी होती है।
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इसलिए बनी प्रशिक्षण की योजना

हालांकि, प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक का तर्क है कि इन कार्यक्रमों के पीछे संगठनात्मक ढांचा दुरुस्त करने के अलावा कोई और वजह नहीं है। यह बात ध्यान रखने की है कि हमने पहले की तुलना में पांच गुना से अधिक (लगभग पौने दो करोड़) लोगों को पार्टी से जोड़ा है।

इसमें तमाम ऐसे लोग हैं जिन्हें सामान्य तौर पर भी पार्टी की रीतिनीति की जानकारी नहीं है। इसीलिए नीचे के स्तर से प्रशिक्षण का फैसला किया गया है। इसके लिए टीम बना दी गई है। ब्लाकों तक प्रशिक्षण शिविर लगाए जाएंगे ताकि नए सदस्य पार्टी के बारे में परिचित हो सकें।

आमजन के बीच मोदी के काम पहुंचाने की मंशा
भले ही पाठक यह तर्क दे रहे हों लेकिन बात इतनी भर नहीं है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की कोशिश यह भी है कि पीएम नरेन्द्र मोदी का कामकाज आमजन के बीच पहुंचे। इसीलिए इस बार सदस्यता के तौर तरीकों को न सिर्फ नई प्रक्रिया में ढाला गया है बल्कि उसका स्वरूप भी बदला गया है।

संभवत: नेतृत्व का मानना है कि पार्टी के लोग जब बार-बार जनता के बीच जाएंगे तो मोदी सरकार के कामों को लेकर कोई चर्चा जरूर होगी। लोग किसी न किसी रूप में पार्टी के लोगों से सवाल भी पूछेंगे। तब स्वाभाविक रूप से महासंपर्क या प्रशिक्षण के महाअभियान पर जाने वाले नेता व कार्यकर्ता सरकार की तरफ से कुछ न कुछ तर्क जरूर देंगे।
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