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दिल्ली जाने के लिए बढ़ रही है भाजपाईयों की बेकरारी

Tue, 10 Jun 2014 01:40 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
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भाजपा के केंद्रीय संगठन में फेरबदल की चर्चा शुरू होते ही सूबे में पार्टी के कई नेता दिल्ली जाने की जुगत और जोड़तोड़ में जुट गए हैं। सभी के अपने तर्क हैं तो अपनी उम्मीदें भी।
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इसके लिए पैरवी से लेकर परिक्रमा तक शुरू हो गई है। नेताओं के घरों पर दस्तक देना शुरू हो गया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह केंद्रीय गृहमंत्री हो गए हैं।

उनके अलावा भी पार्टी के कई अन्य पदाधिकारी भी मंत्री बन गए हैं। उत्तर प्रदेश की बात करें तो पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष उमा भारती ही केंद्रीय जल संसाधन मंत्री बन गई हैं।
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भाजपा के संविधान ‘एक पद, एक व्यक्ति’ के मुताबिक, मंत्री बनने वाले संगठन में पदाधिकारी नहीं रह सकते हैं। जाहिर है कि इनकी जगह नए पदाधिकारी बनाना होगा। इसलिए उत्तर प्रदेश के भाजपाइयों के दिल में भी दिल्ली में जमने की बेकरारी तेज हो गई है।

अध्यक्ष पद के लिए यूपी का कोई नाम नहीं

यूपी के भाजपाई यूं ही दौड़भाग नहीं कर रहे हैं। इसके पीछे वजह भी है। नए अध्यक्ष के रूप में जो तीन नाम ओम माथुर, जगत प्रकाश नड्ढा और अमित शाह के चल रहे हैं। उनमें कोई भी उत्तर प्रदेश का नहीं है।

उमा भारती के रूप में उपाध्यक्ष का भी एक पद यूपी के हिस्से से चला जाएगा। कल्याण सिंह के राज्यपाल बनने की चर्चा है।

भाजपाइयों को लगता है कि ऐसा होने से सूबे के कोटे में उपाध्यक्ष का एक और पद खाली हो जाएगा। कुल मिलाकर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के दो पद यूपी के कोटे के खाली हो जाएंगे।

यह पद किसी दूसरे प्रदेश से भरने के बजाय उत्तर प्रदेश के लोगों को ही पदोन्नत करके भरे जाएंगे। राजनाथ सिंह के राष्ट्रीय अध्यक्ष न रहने पर सूबे के हिस्से में कुछ और पदाधिकारियों के पद भी आ सकते हैं।

मोदी का यूपी प्रेम भी एक वजह

यह तर्क यूं ही नहीं है। पूरे परिदृश्य पर नजर दौड़ाएं तो इनमें काफी दम नजर आता है। मोदी ने लोकसभा की बड़ौदा सीट से त्यागपत्र देकर यह साफ कर दिया है कि वह जन्म से भले ही गुजराती हो लेकिन अब कर्म से वह उत्तर प्रदेश वाले बनना चाहते हैं।

इस बार भी वह उत्तर प्रदेश के प्रतिनिधि के रूप में देश की सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। जाहिर है कि मोदी कभी नहीं चाहेंगे कि भाजपा उत्तर प्रदेश में कमजोर दिखे।

इसलिए वह हर हालत में यही कोशिश करेंगे कि लोकसभा चुनाव में सूबे से भाजपा को मिला समर्थन भाजपा संगठन की स्थायी शक्ति बने।

भाजपा की पहुंच व पकड़ मजबूत बने और निचले स्तर तक संवाद की स्थिति बने। साथ ही जिन सामाजिक समीकरणों से भाजपा को इतना बहुमत मिला है, वह समीकरण कम से कम सूबे के विधानसभा चुनाव तक बने रहें।
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इसलिए भी बन रहा है मौका

राजनीतिक समीक्षकों की मानें तो चुनावी राजनीति के महारथी साबित हो चुके मोदी जानते हैं कि यूपी में पार्टी को अगर वह फर्श से अर्श तक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं तो उसके पीछे न सिर्फ अगड़ों के साथ पिछड़े वोटों की लामबंदी है बल्कि दलित वोटों का बड़ा हिस्सा भी भाजपा के आकर खड़ा हो जाना है।

ऐसे में इस बात की ज्यादा संभावना है कि केंद्रीय टीम में उत्तर प्रदेश की इस बार भागीदारी बढ़ जाए।

जुगाड़ में जुटे
सूबे के भाजपाइयों में कुछ की नजर प्रवक्ता पद पर है। पार्टी के एक प्रवक्ता तो राष्ट्रीय प्रवक्ता बनने की चाह में दिल्ली भी पहुंच गए हैं। टिकट कट जाने वाले एक भगवा चेहरे की कोशिश है कि उन्हें भी मुख्यधारा में शामिल कर लिया जाए और राष्ट्रीय टीम में जगह मिल जाए।

पार्टी और पत्रकारों के बीच सेतु की भूमिका का निर्वाह कर रहे एक सज्जन चाहते हैं कि वह मुख्य भूमिका में आ जाएं। इसी तरह अन्य कई भी अपने-अपने तरीके से पद पाने या तरक्की पाने की कोशिश में जुटे हैं।
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