कोशिश रहती है कि सभी मरीजों को इलाज मिल सके। मरीज के आने पर उसकी स्थिति का आकलन करने में थोड़ा समय जरूर लग जाता है। वेंटिलेटर खाली न होने पर परिजनों को इसकी जानकारी दे दी जाती है। इसके बाद भी कुछ लोग वेंटिलेटर मिलने के इंतजार में प्रयास करते रहते हैं, जिसके कारण मरीज की जान जोखिम में पड़ जाती है। इस मरीज के मामले में भी ऐसा ही हुआ होगा।- डॉ. प्रेमराज सिंह, सीएमएस, ट्रॉमा सेंटर, केजीएमयू
मरीज को आईसीयू में शिफ्ट करा दिया गया था। काफी देर तक इंतजार करने की जानकारी नहीं है। परिजनों ने कोई भी शिकायत दर्ज नहीं कराई है।- डॉ. हिमांशु, सीएमएस, बलरामपुर अस्पताल
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राजधानी के सरकारी मेडिकल संस्थानों और अस्पतालों में वेंटिलेटर की उपलब्धता ने चिंता जताई है। कोर्ट ने राज्य सरकार से वेंटिलेटर की संख्या और उनकी वर्तमान स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट और शपथ पत्र मांगा है।
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए लखनऊ के सभी प्रमुख सरकारी अस्पतालों से वेंटिलेटर का पूरा आंकड़ा मांगा है। कोर्ट ने पिछली सुनवाइयों में स्पष्ट किया कि वह यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उपलब्ध वेंटिलेटर मरीजों की जान बचाने के लिए पर्याप्त हैं या नहीं और कितने वेंटिलेटर वर्तमान में कार्यशील हैं।
इस मामले में न्यायालय ने चिकित्सा संस्थानों को यह आदेश भी दिया है कि वे शपथ पत्र के माध्यम से बताएं कि उनके पास कुल कितने वेंटिलेटर हैं और वास्तव में कितने की आवश्यकता है। अक्टूबर 2025 में हुई सुनवाई के दौरान भी कोर्ट ने राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी और मामले की गंभीरता को देखते हुए नियमित निगरानी की बात कही थी।