कार्यक्रम में मौजूद यूनानी चिकित्सक।
लखनऊ। लिवर की गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज यूनानी दवाओं के जरिये ठीक हो रहे हैं। लिवर सिरोसिस की तीसरी व चौथी स्टेज में आए मरीजों को एलोपैथ में ट्रांसप्लांट की सलाह दी जाती है, जबकि यूनानी दवाओं के जरिये तीसरी व चौथी स्टेज के मरीज ठीक होने का दावा है। यह जानकारी दिल्ली जामिया हमदर्द से रिटायर्ड हकीम मोहम्मद अख्तर सिद्दीकी ने दी।
वह रविवार को नेशनल यूनानी डॉक्टर्स वेलफेयर एसोसिएशन (नुडवा) की ओर से नाका हिंडोला स्थित एक होटल में नुडवाकॉन-2025 एवं जनरल बॉडी मीटिंग में मौजूद रहे। मुख्य अतिथि निदेशक यूनानी सेवाएं उत्तर प्रदेश प्रो. जमाल अख्तर रहे। देश-प्रदेश से बड़ी संख्या में यूनानी चिकित्सकों ने भाग लिया।
हकीम मोहम्मद अख्तर सिद्दीकी ने बताया कि उनके पास क्रॉनिक हेपेटाइटिस बी-सी, एल्कोहलिक व नॉन एल्कोहलिक के 374 मरीज पंजीकृत हैं। इसमें लिवर सिरोसिस की चौथी स्टेज में पहुंच चुके कई मरीजों को डॉक्टरों ने लिवर ट्रांसप्लांट की सलाह दी थी, मगर मरीजों ने यूनानी विधा की ओर रुख किया और उनमें एक माह के अंदर ही यूनानी दवाओं का बड़ा असर दिखा। लिवर सिरोसिस मरीजों का पीलिया एक माह के भीतर गायब हो गया। छह माह के इलाज के बाद वे स्वस्थ हैं।
उन्होंने बताया कि यूनानी दवाओं का खर्च भी महंगा नहीं है। माह में छह से सात हजार रुपये का खर्च आता है। चेन्नई से आए हकीम इमामुद्दीन ने डायबिटिक फुट पर ऑनलाइन व्याख्यान दिया। प्रो. कमरूल हसन लारी ने संपूर्ण इलाज के लिए प्रभावी संवाद का महत्व बताया। प्रो. जमाल अख्तर ने बताया कि प्रदेश सरकार यूनानी चिकित्सा के विकास के लिए लगातार कार्य कर रही है, नियुक्तियां की जा चुकी हैं और बरेली में तीसरा राजकीय यूनानी कॉलेज शीघ्र शुरू होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता नुडवा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. एस. मुईद अहमद व संचालन डॉ. सलमान खालिद ने किया।