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सबसे जीते, पर 'घर' में ही हार गए टीपू!

Sun, 16 Mar 2014 08:17 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
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पिता और सपा मुखिया के रूप में मुलायमसिंह यादव की दोहरी भूमिका से कई बार सरकार और मुख्यमंत्री के सामने असहज स्थिति पैदा हुई।
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कभी कानून व्यवस्था तो कभी विकास कार्यों को लेकर अखिलेश सरकार को कटघरे में खड़ा किया। यहां तक कहा कि वे सीएम होते तो 15 दिन में कानून व्यवस्था दुरुस्त कर देते।

वे सरकार में चापलूसी से काम होने पर नसीहत देते दिखाई दिए। सरकार से पार्टी के बड़ा होने का अहसास भी कराते रहे।

अखिलेश को एक बार तो यह कहना पड़ा कि उन्हें पता नहीं लगता कि नेताजी कि कब पिता की भूमिका में होते और कब राष्ट्रीय अध्यक्ष की।

आजम खां : पार्टी के सामानांतर खड़े नजर आए

नगर विकास मंत्री आजम खां कई बार पार्टी के समानांतर खड़े नजर आए। महासचिव होने के बावजूद आगरा में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल नहीं हुए।

कैबिनेट की आधा दर्जन से ज्यादा बैठकों में लगातार गैरहाजिर रहे। निजी विश्वविद्यालय स्थापित करने के मानक शिथिल करने के प्रस्ताव पर उखड़े तो कैबिनेट बैठक से उठ गए।

गाजियाबाद में हज हाउस के लिए अड़ंगा लगाने पर सरकार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया।

इतना ही नहीं, इनके निजी स्टाफ का ही मामला इतना तूल पकड़ा जो अब तक शांत नहीं हो पाया। इससे भी अखिलेश सरकार की जमकर फजीहत हुई।

रामगोपाल यादव: नजरअंदाज करना असंभव

सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने राष्ट्रीय स्तर और प्रदेश स्तर पर युवा फ्रंटल संगठनों को उन्होंने एक झटके में भंग कर दिया।

रिमोट सैंसिंग एप्लीकेशन सेंटर के चेयरमैन रामआसरे कुशवाहा से लेकर सपा के राष्ट्रीय सचिव कमाल फारूखी तक कई नेताओं को उनका कोपभाजन बनना पड़ा।

उनके फैसलों को नजरंदाज करना सीएम के लिए असंभव सा है। कहा जाता है कि एनसीआर से जुड़े कई फैसले उनकी सहमति के बिना नहीं होते।

रामगोपाल का पार्टी में कद इतना ऊंचा है कि वह कभी भी-किसी को भी कुछ भी बोल देते हैं। उनकी इस आदत का नुकसान कभी-कभी पार्टी के लोगों को भी उठाना पड़ता है।

शिवपाल सिंह यादव: सत्ता का केंद्र बने

लोक निर्माण, सिंचाई, राजस्व और सहकारिता जैसे महत्वपूर्ण महकमों के मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने सार्वजनिक तौर पर तो सरकार की फजीहत नहीं कराई लेकिन वे सत्ता का एक केंद्र जरूर बने हुए हैं।

विधायकों, मंत्रियों, नेताओं और कार्यकर्ताओं का उनके यहां तांता लगा रहता है। कई बैनरों और पोस्टरों को ध्यान से देखा जाए तो शिवपाल अलग ही संदेश देते नजर आते हैं।

जहां सपा के ज्यादातर नेता राज्य के लोगों को बधाई देते दिखते हैं, वहीं शिवपाल देश स्तर का सपना संजोए नजर आते हैं। इसके पीछे क्या राज है, ये किसी को नहीं पता।

कहा तो यहां तक जाता है कि शिवपाल अपने ‌बेटे को लेकर भी काफी टशन में रहते हैं और उसे अखिलेश जैसा मुकाम दिलाना चाहते हैं।
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मंत्रियों ने खूब कराई फजीहत

मंत्रियों और पार्टी के खास सिपहसालारों की अजब-गजब हरकतें भी अखिलेश सरकार के लिए सिरदर्द साबित हुईं। ऐसी ही वजहों से मंत्री पद खोने वाले विनोद सिंह उर्फ पंडित सिंह और रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया की मंत्रिमंडल में वापसी हुई।

उधर, मंत्रिमंडल विस्तार के बावजूद दूसरा साल पूरा होने पर भी अखिलेश उनके विभागों के बंटवारे से बचते दिखाई दिए। कृषिमंत्री आनंद सिंह अपने जूनियर मंत्री राजीव कुमार से लड़ने-भिड़ने के कारण चर्चा में रहे तो ऐन चुनाव से पहले बेटे कीर्तिवर्धन के भाजपा में शामिल होने की वजह से मंत्री पद गंवा बैठे।

मनोज पारस को भी विवादों के कारण मंत्री पद से हाथ धोना पड़ा। इन सबके बीच सरकार और पार्टी की सबसे अधिक फजीहत कराई मंत्री दर्जा प्राप्त तौकीर रजा ने, जो अपनी ही सरकार पर लगातार निशाना साधते रहे और आखिरकार इस्तीफा देकर अपनी पार्टी बना ली।

सपा विधायक इरफान सोलंकी तो इन सबसे आगे निकल गए, जिनकी वजह से ऐन चुनाव से पहले पूरे प्रदेश को डॉक्टरों की हड़ताल का सामना करना पड़ा और सरकार को तरह-तरह के सवालों का। गनीमत यह रही कि मामला देशव्यापी हड़ताल का रुख करने से पहले संभल गया।
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