चौधरी चरण सिंह की 111वीं जयंती पर सोमवार को सूबे में उनके अनुयायियों में धड़ेबंदी साफ नजर आई।
एक तरफ सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव खुद को चौधरी साहब का सच्चा उत्तराधिकारी होने का दावा साबित करने की कोशिश करते दिखे तो दूसरी तरफ चौधरी चरण सिंह के पुत्र चौधरी अजित सिंह भी ऐसा ही करते नजर आए।
परिदृश्य अपने-अपने चौधरी जैसा दिखाई दिया। दोनों धड़ों पर चौधरी साहब के नाम की संपत्ति अपनी-अपनी तिजोरी में बंद करने की फिक्र सवार दिखी।
यह उतावलापन भी सामने आया कि दूसरा धड़ा इस संपत्ति को हड़प न जाए। मुलायम की समाजवादी पार्टी की सरकार ने चौधरी साहब की जयंती पर छुट्टी घोषित कर खुद को असली वारिस साबित करने की कोशिश की।
तो चौधरी अजित सिंह की मौजूदगी वाली केंद्र सरकार ने जाटों को आरक्षण देने की घोषणा कर इस विरासत पर अपना अधिकार होने का संदेश देने का प्रयास किया। राजधानी में स्थापित चौधरी साहब की प्रतिमा पर पहले माला पहनाने को लेकर झगड़ा जैसा दृश्य दिखा।
मुलायम और अजित ने कुछ वर्ष पहले फिर अलग-अलग रास्ता चुन लिया था। पर, आज दोनों तरफ से यह संदेश देने की कोशिश भी हुई कि चौधरी साहब की विरासत पर सिर्फ उनका ही अधिकार है।
चौधरी चरण सिंह के ये उत्तराधिकारी चौधरी साहब को दो हिस्सा में बांटते दिखे। श्रद्धांजलि दोनों खेमों ने दी। दोनों तरफ खुद को चौधरी साहब का सच्चा उत्तराधिकारी बताया गया। पर, एक-दूसरे का जिक्र तक नहीं किया।
न इन्हें उनकी याद और न उन्हें इनकी
रालोद की रैली में शरद यादव आए, केसी त्यागी आए। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह और हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी रैली में शामिल हुए।
पर, अजित सिंह ने उन मुलायम सिंह को बुलाने की जरूरत तक नहीं समझी जो खुद को चौधरी साहब का असली उत्तराधिकारी बताते हैं। जो चौधरी साहब के लिए राजनारायण के साथ नहीं खड़े हुए।
अजित सिंह तो उस समय अमेरिका में ही रहते थे। मुलायम सिंह को भी चौधरी साहब को श्रद्धांजलि देते वक्त उनके पुत्र अजित सिंह की याद तक नहीं आई। किसी तरफ से यह पहल नहीं हुई कि विरासत को बांटने की कोशिश करने के बजाय एक साथ उसे संभाले।
झगड़ा तो वोटों का है
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो झगड़े की वजह चौधरी साहब के नाम पर मिलने वाले जाट वोट का है। इसीलिए दोनों तरफ से अपने चौधरी-अपने चौधरी की होड़ शुरू हो गई है।
इनका कहना है कि बदली परिस्थितियों में कांग्रेस को भी जाटों का वोट चाहिए तो मुलायम सिंह यादव को भी इसकी दरकार है। इसलिए चौधरी साहब की मृत्यु के लगभग ढाई दशक बाद दोनों को उनके नाम पर छुट्टी घोषित करने या जाटों को आरक्षण देने की सुध आई है।
असली मामला चौधरी साहब की जाति व ख्याति का लाभ उठाकर अपने वोटों में इजाफा करने की है। इसीलिए दो उत्तराधिकारियों के बीच विरासत का झगड़ा शुरू हो गया है।
इसी का प्रदर्शन सोमवार को राजधानी में हुआ। ‘पहले आप’ कहने वाली जमीन पर चौधरी साहब की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने के लिए ‘पहले हम’ का शोर सुनाई पड़ा।
पुराना है झगड़ा
वरिष्ठ पत्रकार और पूरे घटनाक्रम के साक्षी रहे विक्रम राव कहते हैं कि बेटा होने के कारण अजित सिंह चौधरी चरण सिंह के उत्तराधिकारी हैं तो कर्म के आधार पर मुलायम सिंह यादव का पलड़ा भारी पड़ता है।
वैसे भी यह झगड़ा नया नहीं है। वर्ष 1989 में प्रदेश में जनता दल को बहुमत मिलने के साथ ही इसकी नींव पड़ गई थी। जब नेता विधानमंडल दल या मुख्यमंत्री का नाम वोट से तय हो पाया था।
चौधरी अजित सिंह और मुलायम सिंह यादव के बीच मतदान से फैसला हो पाया। अजित सिंह एक या दो वोट से मुलायम से हार गए थे।
राव कहते हैं,तय तो जनता को करना है कि वह किसे चौधरी साहब का असली वारिस मानती है। पर, आज चौधरी अजित सिंह से मेरे जैसे लोग इस सवाल का जवाब जरूर चाहते हैं कि उन्होंने अपने पिता की राह पर चलते हुए उत्तर प्रदेश के किसानों और आम लोगों की भलाई के लिए कौन-कौन से जमीनी काम किए।
जमीनी न सही, इनसे तो हवाई काम भी नहीं हो पाया। कम से कम हिंदी भाषी राज्य और किसानों के नेता होने का दावा करने वाले अजित लखनऊ को पटना या अन्य हिंदी भाषी राज्यों से जोड़ने के लिए कम से कम हवाई सेवा ही शुरू करा देते तो यूपी वालों को संतोष हो जाता।