डॉक्टरों द्वारा किए गए इलाज से ठीक हुए मरीजों की काफी चर्चाएं होती हैं, लेकिन इलाज के दौरान दम तोड़ चुके मरीज की कभी बात नहीं होती।
ट्रॉमा केसेस या अचानक सामने आई एडवांस स्टेज की बड़ी बीमारी में एक दिन से लेकर कुछ ही दिनों में होने वाली मौतों के मुकाबले हीमेटोलॉजिस्ट्स के पास मरीज एक दिन में दम नहीं तोड़ते।
मरने से पहले वे कई हफ्तों और महीनों तक डॉक्टरों से बार बार मिलते हैं, इस दौरान दोनों में एक जुड़ाव भी पैदा होता है। इसके बावजूद जब मरीज की मौत होती है तो उसे भी भुला दिया जाता है।
लेकिन इसके पीछे हर डॉक्टर की इसकी अपनी वजह हो सकती हैं। रविवार को लखनऊ के एसजीपीजीआई में खत्म हुई हीमेटोलॉजी पर दो दिवसीय सेमिनार में इस संवेदनशील मुद्दे पर चिकित्सकों ने अपने अनुभव साझा किए।
वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में न्यूरो मस्क्युलर बीमारी की वजह से भोजन-पानी निगलने की क्षमता खो बैठा एक युवा मरीज भर्ती हुआ। वह निगलने की क्षमता वापस पा सके, इसके लिए एक सर्जरी की गई।
तभी उसकी हालत बिगड़ गई। उसे तुरंत वेंटीलेटर पर रखा गया। तीन महीने तक उसे वेंटीलेटर पर रखा गया। परिवार ने सभी संसाधन लगा दिए, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। वे उसका और इलाज करवा पाने में असमर्थ थे।
मरीज वेंटीलेटर पर चेतन अवस्था में था। वह बोल नहीं पा रहा था, लेकिन लिखकर बात कम्युनिकेट कर रहा था। उसे बचाने के फिर से प्रयास किए गए, लेकिन असफल रहे। अंतत: वेंटीलेटर सपोर्ट हटाया गया।