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एयरइंडिया की फ्लाइट से लखनऊ आ रहे हैं कछुए

Sat, 23 May 2015 03:12 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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23 मई शनिवार को मनाया जा रहा विश्व कछुआ दिवस 400 कछुओं की ‘घर वापसी’ का दिन बनने जा रहा है। दुर्लभ होते जा रहे इन बेजुबान खूबसूरत वन्यजीवों के लिए शनिवार को लंबे हवाई सफर के बाद ‘घर वापसी’ होगी।
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उप्र के तमाम इलाकों से तस्करों द्वारा पकड़ कर विदेश पहुंचाए जा रहे कछुओं को मुंबई में पकड़ा है, जिन्हें कछुआ संरक्षण में लगे वन्यजीव प्रेमी शनिवार को हवाई यात्रा के बाद लखनऊ में ही इन्हें आजाद करेंगे।

कुकरैल घड़ियाल-कछुआ पुनर्वास केंद्र लखनऊ में इन 400 से अधिक बेजुबानों को लंबे हवाई सफर कि बाद आजाद किया जाएगा। टीएसए संस्था की अरुणिमा सिंह ने शुक्रवार को बताया कि छोटे साइज के काला कांठा (ब्लैक स्पॉटेड टर्टल) को अक्सर लोग पालने समेत कई अन्य उपयोगों के लिए खरीदते हैं।
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मुंबई में बीते दिनों ही इनकी खेप पकड़ी गई। चूंकि वहां कछुओं के लिए बेहतरीन परिवेश नहीं है, इसलिए उन लोगों ने हमसे संपर्क किया। हमारी एक टीम शनिवार को मुंबई से इन्हें लखनऊ लेकर आएगी।

बनती हैं यौन शक्तिवर्धक दवाएं

सुखद संयोग है कि विश्व कछुआ दिवस पर ये एक्टिविटी होगी, उन्हें कुकरैल घड़ियाल-कछुआ पुनर्वास केंद्र में प्राकृतिक आवास में रिलीज किया जाएगा। इस दौरान वन विभाग के कई आला अधिकारी भी मौजूद रहेंगे। एशिया में है, जहां एक खास संप्रदाय के लोग, इन्हें पालते हैं।

इसके अलावा करीब दर्जन भर से ज्यादा प्रजातियों के कछुओं की डिमांड पूर्वी एशिया के मुल्कों में लजीज डिशेज और यौनशक्ति वर्धक दवाइयों के लिए भी बढ़ी है।

विशेषज्ञों ने बताया कि स्थानीय स्तर पर ये 200 से 500 रुपये प्रति पीस शिकारियों द्वारा लोकल तस्कर को बेचते हैं, लेकिन जैसे-जैसे ये मार्केट में आगे बढ़ते हैं इनके दाम भी बढ़ते जाते हें।

विदेशों में है डिमांड

कछुआ संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक मेट्रो सिटीज में इन्हें लोग शौकिया अच्छी कीमत चुकाकर खरीद लेते हैं।

टीएसए की अरुणिमा सिंह ने बताया कि भारत के महानगरों में ही नहीं, विदेशों में इन्हें अपने घर के पॉंड में पालने के लिए लोग 20 से 30 हजार रुपये प्रति कछुए के लिए खर्च करने को तैयार है।

भारत में पाए जाने वाले काला कांठा (ब्लैक स्पोटेड टर्टल) पर पिछले एक दशक से संकट गहराया है। उत्तर भारत के तराई इलाकों में पाए जाने वाले इन कछुओं की तस्करी महानगरों के अलावा विदेशों में इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि इन्हें लोग कुत्तों, बिल्लियों, मछलियों और पक्षियों की तरह पालने लगे हैं।

इनके शेल और शरीर पर पड़ने वाले स्पॉट इन्हें ऐसा खूबसूरत बनाते हैं कि लोग इनके लिए 20 से 30 हजार और कहीं-कहीं तो 40 हजार रुपये तक के दाम चुकाते हैं। लोग इन्हें खरीदते हैं, क्योंकि उन्हें नहीं मालूम कि इन्हें पालना अपराध की श्रेणी में आता है।
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सूबे में पाए जाते हैं 10 प्रकार के कछुए

सूबे में अब सिर्फ आठ से 10 प्रकार की कछुओं की प्रजाति ही बची हैं। भारत में पाई जाने वाली 28 प्रजातियों का ये एक तिहाई हिस्सा ही है।
टर्टल रेस्क्यू विशेषज्ञों के मुताबिक जिसमें से ढोर प्रजाति वर्ष 2003 से गोमती से पूरी तरह से विलुप्त हो चुकी है।

प्रदेश में साल, काली ढोढ़, भूतकाथा, हल्दी काथा, भारतीय काला कछुआ, पहाड़ी त्रिकुटी, स्योतर, कटहावा, मोरपंखी, सुंदरी, कोरी पचेड़ा, ब्राह्मणी, पचेड़ा और पार्वती मुख्य रूप से पाई जाती हैं।

इन्हें जल तंत्र का गिद्ध माना जाता है। इनसे नदियों, तालाबों का जैविक प्रदूषण दूर रहता है। विश्व में कछुओं की 300 से भी ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं।
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