हल्दी में मिलने वाले करक्यूमिन को नैनोतकनीक से नैनो-पार्टिकल में एनकैप्सूलेट कर अल्जाइमर का प्रभावी इलाज तलाशने में वैज्ञानिकों को सफलता मिली है।
हल्दी में पाए जाने वाले प्राकृतिक तत्व करक्यूमिन के नैनो पार्टिकल के रूप में उपयोग से अल्जाइमर का प्रभावी इलाज संभव हो सकेगा।
नैनो साइज के चलते इस करक्यूमिन कंपाउंड को ब्रेन तक आसानी से पहुंचाया जाएगा। वहीं याददाश्त बनाए रखने के लिए जरूरी न्यूरोन्स के रिजनरेशन में भी यह खोज प्रभावी होगी।
आईआईटीआर के निदेशक डॉ. कैलाश चंद गुप्ता और साइंटिस्ट डॉ. रजनीश कुमार चतुर्वेदी की टीम ने यह खोज की है। डॉ. चतुर्वेदी के मुताबिक, हल्दी में पीलेपन के राज करक्यूमिन तत्व से न्यूरोन्स को नए सिरे से पैदा करने में मदद मिलती है।
रिसर्च के दौरान नैनो तकनीक से करक्यूमिन तत्व पॉलीमर नैनो पार्टिकल्स के अंदर एन कैप्सूलेट किया गया। ये पॉलीमर नैनो पार्टिकल्स बायोडिग्रेडेबल और नॉन टॉक्सिक होते हैं।
वहीं, इससे नैनो साइज के कंपाउंड को सीधे ब्रेन तक पहुंचाने में मदद मिली। पहली दफा इस खोज से मिले एन कैप्सूलेटिड करक्यूमिन से न्यूरोन्स के प्रोडक्शन को कई गुना तेज किया जा सकेगा।
इससे अल्जाइमर के अलावा न्यूरोडिजनरेटिव डिस्ऑर्डर का इलाज करने में मदद मिल सकेगी।
डॉ. चतुर्वेदी ने बताया कि ब्रेन में हिप्पो कैंपस रीजन याददाश्त को रेग्युलेट करता है। यहां स्टेम सेल की मदद से न्यूरोन्स पैदा होते हैं जो मृत न्यूरोन्स की जगह लेते हैं।
अल्जाइमर में यह प्रक्रिया मंद पड़ जाती है। अब तक मौजूद पाउडर फार्म दवाएं 15-20 प्रतिशत तक ही करक्यूमिन ब्रेन तक पहुंचाती थीं। बाकी कंपाउंड मेटाबोलाइज हो जाता था।
डॉ. गुप्ता ने बताया कि नए कंपाउंड में नैनो पार्टिकल जो कि पॉली लैक्टिक को-ग्लाइकोलिक एसिड (पीएलजीए) से तैयार हुआ, ने इसे अल्जाइमर डिजीज मॉडल में कई गुना प्रभावी बना दिया।
वहीं, करक्यूमिन को धीरे-धीरे और लंबे समय तक रिलीज किया। चूहों पर किए गए प्रयोग में भी वैज्ञानिकों की टीम ने इसे इंट्रो-पैरेटेनियल (आईपी) रूट से इंजेक्ट किया।
चूहों को पहले एमीलॉयड बीटा प्रोटीन्स से अल्जाइमर बीमारी का मॉडल बनाया गया। एनीमल टेस्ट में भी ब्रेन को विकसित करने में एन कैप्सूलेटिड करक्यूमिन कंपाउंड तीन गुना प्रभावी रहा।