स्थान- किंतूर और सतरिख, बाराबंकी
लखनऊ से दूरी- 67.7 किमी
कितना लगेगा समय- लगभग 1 घंटे 10 मिनट
बाराबंकी जिले के बड़ोसराय में स्थित किंतूर यूं तो बहुत प्रसिद्ध नहीं है लेकिन वीकेंड प्लान में बिल्कुल फिट बैठता है।
इसके पीछे दो वजहें हैं, एक तो यह कि इस गांव में स्वर्ग का पेड़ कहा जाने वाला पारिजात देखने को मिलता है जिसे हर कोई देखना चाहता है और दूसरा यहां का भव्य कुंतेश्वर मंदिर।
बाराबंकी हेडक्वार्टर से 38 किमी दूर किंतूर के बारे में कहा जाता है कि इसे पांडवों की माता कुंती के नाम पर बसाया गया है। लोग यह भी मानते हैं कि यह पारीजात पेड़ कुंती ने ही अपने हाथ से लगाया था।
बताया जाता है कि यहां आने वालों में सबसे ज्यादा उत्सुकता इसे देखने और छूने की होती है। इसके अलावा आप कुंतेश्वर मंदिर भी जा सकते हैं। यह मंदिर भी कुंती को ही समर्पित है।
हालांकि यह कोई ऐसा स्थान नहीं जहां आप पूरा दिन बिता सकें इसलिए विकल्प के तौर पर आप सतरिख जाने का प्लान बना सकते हैं। सतरिख का वास्तविक नाम सप्तर्षि था क्योंकि यहीं पर गुरू वशिष्ष्ठ ने सुर्यवंशी कुल के राजकुमारों को शिक्षा दी थी।
वैसे अगर आपको इतिहास में थोड़ी-बहुत रूचि हो तो यहां एक और चीज देखने लायक है, वह है सैयद सलार मसूद के पिता सलार शाह का मकबरा। यहां जेठ के महीने में पूर्णिमा के दिन होने वाला धार्मिक समागम देखते बनता है।
वजूद पे कैसे-कैस दावे
वैसे पारीजात पेड़ यहां कब आया और इसे कौन लाया इसकी जानकारी शायद ही किसी को हो। लेकिन इसके बारे में अलग-अलग कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं।
कोई कहता है कि भीम अपनी मां कुंती के लिए इसे स्वर्ग से लेकर आए थे क्योंकि वह इसी फूल से भगवान शिव की पूजा करती थीं। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि यह पेड़ कुंती की राख से उत्पन्न हुआ था।
आखिर क्या महत्व है पारीजात का?
ऐसी मान्यता है कि यह पेड़ कल्पवृक्ष की तरह है और इससे जो भी मुराद मांगी जाए, पूरी हो जाती है।
यही वजह है कि आज भी नव विवाहित जोड़े अपने सुखमय दांपत्य जीवन की कामना से यहां एक बार जरूर आते हैं।