जनाब बड़ी अदालत में वकील हैं तो दांव-पेंच में माहिर होना लाजिमी है। इसलिए चुनाव आते ही एक बार फिर टिकट के लिए पैंतरेबाजी करने लगे।
साल 2009 में चुनाव हारने के बाद घर बैठे वकील साहब को अचानक भाजपा की याद आ गई। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह लखनऊ आए तो तिकड़म करके उन्हें अपने घर भोजन पर बुला डाला।
राजनाथ पहुंचे तो जनाब घूम-फिरकर पहुंच गए मतलब की बात पर। घर के नीचे बेसमेंट में बने आलीशान हाल को दिखाते हुए बोले, ‘पिछली बार पार्टी ने चुनाव लड़ाने का फैसला किया तो मैंने यह सोचकर इसका निर्माण कराया था कि पार्टी के कार्यकर्ता आएंगे तो उन्हें कोई तकलीफ न हो।
इसके लिए कर्ज भी लेना पड़ा। पर, क्या करूं ईश्वर को मंजूर नहीं था। इस बार शायद ईश्वर की कृपा हो जाए तो यह हाल भी कार्यकर्ताओं से गुलजार हो जाए।’
मौजूद लोगों को माजरा समझते देर न लगी। पर, वकील साहब यहीं नहीं रुके। बोेले, ‘कई बार दूसरे दलों से ऑफर आए। पर मैंने कहा पार्टी मां होती है।
कोई अपनी मां को छोड़ता है।’ इतनी बातें सुनने के बाद कुछ कार्यकर्ताओं का सब्र जवाब दे गया था। बेचारे! राष्ट्रीय अध्यक्ष के सामने तो कुछ बोल नहीं सकते थे। तो अब कहते घूम रहे हैं, ‘भाजपा की दुर्दशा की वजह समझ में आ गई।
जिस मां को मौके-मौके याद करने वाले बेटे हो जाएं तो उसका यही हाल होता है।’