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कुछ यूं तैयार हुई 6 दिसंबर को अयोध्या ढांचा विध्वंस की पृष्ठभूमि, दोस्त हुए दुश्मन, दुश्मन हुए दोस्त

Thu, 01 Oct 2020 12:14 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह व मुलायम सिंह यादव। - फोटो : amar ujala
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मकर संक्रांति तारीख 14 जनवरी 1991। प्रयागराज में माघ मेला चल रहा था। विहिप के तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय महामंत्री अशोक सिंहल और तमाम संत 30 अक्तूबर और 2 नवंबर 1990 को अयोध्या में मारे गए कारसेवकों की अस्थियां संगम में प्रवाहित करते हैं और संकल्प लेते हैं कि वे मंदिर निर्माण कराकर मारे गए कारसेवकों को सच्ची श्रद्धांजलि न दे पाने तक शांति से नहीं बैठेंगे। यहीं से पड़ी ढांचा ध्वंस की नींव। इसकी एक पूरी अलग कहानी है। इसमें सियासी दांवपेच भी हैं और आस्था व सांविधानिक बंदिशों में जकड़े आस्थावानों की मजबूरियां भी। तो सत्ता के उलटफेर की कहानियां भी हैं।

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दोस्त हुए दुश्मन, दुश्मन हुए दोस्त
अयोध्या में 30 अक्तूबर और 2 नवंबर 1990 को श्री रामजन्मभूमि को मुक्त कराकर मंदिर निर्माण के संकल्प के साथ कारसेवा के लिए आए कई कारसेवक सुरक्षा बलों की गोलियों से मारे गए। इस घटना ने देशभर में न सिर्फ सियासी तूफान खड़ा कर दिया बल्कि केंद्र की तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार और प्रदेश की तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार को लोगों के गुस्से का निशाना भी बनाया।

पीएम और सीएम के बीच भी आपस में दूरियां बढ़ाईं, जो लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी को लेकर शुरू हुई थी। सोमनाथ से रथ लेकर अयोध्या कारसेवा में शामिल होने आ रहे आडवाणी को गिरफ्तार कर मुलायम खुद को सबसे बड़ा धर्मनिरपेक्ष साबित करने का ख्वाब संजोए हुए थे, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने लालू यादव के जरिये ये काम कराकर उनसे यह मौका छीन लिया। उस समय राजनीतिक टीकाकारों का अनुमान था कि इसकी वजह वीपी सिंह का खुद यूपी से होना था। वह मुलायम का कद बढ़ाकर अपना कद कम कैसे करते।

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मुलायम का अनुमान गलत निकला

मुलायम को शायद उम्मीद थी कि उनकी सख्ती से विहिप की कोशिशें थम जाएंगी और उन्हें धर्मनिरपेक्ष नेता होने के साथ मुस्लिम वोटों का लाभ भी मिलेगा और कांग्रेस को भी वह सियासी तौर पर नेपथ्य में ढकेल सकेंगे। पर, सब कुछ उनकी सोच के अनुसार नहीं हुआ।

मुस्लिमों की उनके साथ लामबंदी तो हुई और कांग्रेस के असमंजस ने उसे भी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक तौर पर नुकसान पहुंचाया, लेकिन मुलायम का यह अनुमान गलत निकला कि उनकी सख्ती से विहिप की कोशिशें थम जाएंगी।

कारसेवकों की मौत से पनपे आक्रोश को मुद्दा बनाकर संघ परिवार ने विहिप की अगुवाई में न सिर्फ हिंदुओं का ध्रुवीकरण कराने में कामयाबी हासिल कर ली बल्कि सियासी उलटफेर कराने की शक्ति अर्जित कर ली। यह 6 दिसंबर 1992 को ढांचा ढहाने वाली दूसरी कारसेवा का एक और प्रमुख कारण बनी।

कुछ यूं हुई शुरुआत

अयोध्या में सुरक्षा बलों की गोलियों से कारसेवकों की मौत के बाद आम हिंदुओं में पनपे गुस्से को देखते हुए भाजपा ने 10 नवंबर 1990 को केंद्र की तत्कालीन वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। फिर कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी। प्रदेश में भाजपा ने भी मुलायम से समर्थन वापस ले लिया था। उनकी सरकार भी कांग्रेस के समर्थन पर टिक गई। चंद्रशेखर ने हस्तक्षेप और संवाद कर संतों, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद को इस विवाद का ईमानदारी से समाधान तलाशने का वचन देकर संघर्ष के बजाय सत्याग्रह पर राजी कर लिया।

प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव जो 30 अक्तूबर 1990 से पहले अयोध्या में परिंदा को भी पर न मारने देने का दावा कर रहे थे, वह दबाव में आ चुके थे। कारण, उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद हजारों लोग अयोध्या पहुंच गए थे। दूसरी तरफ हिंदुओं के गुस्से और केंद्र में आ चुकी चंद्रशेखर सरकार के साथ होने पर भी उन्हें जनता के कड़े रुख का सामना करना पड़ रहा था।

देशभर में अस्थिकलश पूजन कराने की रणनीति रही सफल

विहिप के आह्वान पर देश भर से अयोध्या पहुंचकर लोगों ने 6 नवंबर 1991 से सत्याग्रह कर गिरफ्तारियां देनी शुरू कर दीं। इस सत्याग्रह में कारसेवकों की मौत से पनपे आक्रोश को देखते हुए संघ की योजना पर विहिप के तत्कालीन महामंत्री अशोक सिंघल ने उनके अस्थिकलश को देशभर में घुमाकर उनका पूजन कराने का कार्यक्रम बनाया। यह रणनीति सफल रही।

यूपी में इन अस्थिकलशों के पूजन कार्यक्रमों में जुट रही भीड़ बेहिचक और बेखौफ होकर मुलायम के खिलाफ गुस्सा जताने लगी थी। नारेबाजी भी शुरू हो गई थी और लोग मुलायम को ‘मुल्ला मुलायम’ तक कहने में न डर महसूस कर रहे थे और न संकोच।

कारसेवकों के अस्थिकलश के रथों को देश का भ्रमण करते-करते दो महीने से ऊपर हो चुके थे। प्रयागराज में संगम तट पर माघ मेला शुरू हो चुका था। विहिप ने संतों के परामर्श से मकर संक्रांति 14 जनवरी 1991 को संगम में कारसेवकों की अस्थियां प्रवाहित की और वहीं पर संकल्प लिया कि जब तक राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण शुरू नहीं हो जाता तब तक वे चैन से नहीं बैठेंगे।
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मुलायम सिंह को छोड़नी पड़ी सीएम की कुर्सी

दिल्ली के साथ यूपी में भी सियासी परिदृश्य बदल चुका था। बोफोर्स तोपों की खरीद में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जिस कांग्रेस के खिलाफ अभियान चलाकर मुलायम सिंह यादव ने भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई थी, अब उसी कांग्रेस के समर्थन से सरकार चला रहे थे। अयोध्या के मुद्दे पर भाजपा विरोध में खड़ी हो चुकी थी।

उधर, अस्थिकलशों के भ्रमण में उमड़े लोगों ने  विहिप और संतों को मंदिर पर अपनी मुहिम आगे बढ़ाने की ताकत दे दी। दिल्ली के वोट क्लब पर 4 अप्रैल 1991 को विशाल हिंदू रैली आयोजित की गई। मंदिर मुद्दे पर देश भर से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। इसी बीच कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया तो मुलायम सरकार गिर गई। मध्यावधि चुनाव हुए और भाजपा की सरकार बनी।

भाजपा की जीत और कल्याण की सरकार बनने के साथ ही हिंदुओं और संतों की मंदिर निर्माण की आकांक्षा ने तूल पकड़ लिया। ऐसा होना लाजिमी था, क्योंकि उनके अपने बीच से ही कल्याण के रूप में एक कारसेवक ने सरकार का नेतृत्व संभाला था।

आस्थावान आकांक्षी हिंदू और संत कानूनी पेंच व बाधाओं की परवाह किए बिना श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर निर्माण शुरू होने का इंतजार करने लगे। उनकी जुबान पर बस एक ही सवाल था कि प्रदेश में भाजपा सरकार आ गई है तो मंदिर निर्माण में देरी क्यों? भाजपा भी लोगों के मनोभावों को समझ रही थी। पर, रास्ते में कई सांविधानिक और कानूनी बाधाएं खड़ी थीं। इनको हटाए बिना या वैकल्पिक रास्ता तलाशे बिना आगे बढ़ना मुश्किल था।
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