मुलायम को शायद उम्मीद थी कि उनकी सख्ती से विहिप की कोशिशें थम जाएंगी और उन्हें धर्मनिरपेक्ष नेता होने के साथ मुस्लिम वोटों का लाभ भी मिलेगा और कांग्रेस को भी वह सियासी तौर पर नेपथ्य में ढकेल सकेंगे। पर, सब कुछ उनकी सोच के अनुसार नहीं हुआ।
मुस्लिमों की उनके साथ लामबंदी तो हुई और कांग्रेस के असमंजस ने उसे भी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक तौर पर नुकसान पहुंचाया, लेकिन मुलायम का यह अनुमान गलत निकला कि उनकी सख्ती से विहिप की कोशिशें थम जाएंगी।
कारसेवकों की मौत से पनपे आक्रोश को मुद्दा बनाकर संघ परिवार ने विहिप की अगुवाई में न सिर्फ हिंदुओं का ध्रुवीकरण कराने में कामयाबी हासिल कर ली बल्कि सियासी उलटफेर कराने की शक्ति अर्जित कर ली। यह 6 दिसंबर 1992 को ढांचा ढहाने वाली दूसरी कारसेवा का एक और प्रमुख कारण बनी।
अयोध्या में सुरक्षा बलों की गोलियों से कारसेवकों की मौत के बाद आम हिंदुओं में पनपे गुस्से को देखते हुए भाजपा ने 10 नवंबर 1990 को केंद्र की तत्कालीन वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। फिर कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी। प्रदेश में भाजपा ने भी मुलायम से समर्थन वापस ले लिया था। उनकी सरकार भी कांग्रेस के समर्थन पर टिक गई। चंद्रशेखर ने हस्तक्षेप और संवाद कर संतों, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद को इस विवाद का ईमानदारी से समाधान तलाशने का वचन देकर संघर्ष के बजाय सत्याग्रह पर राजी कर लिया।
प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव जो 30 अक्तूबर 1990 से पहले अयोध्या में परिंदा को भी पर न मारने देने का दावा कर रहे थे, वह दबाव में आ चुके थे। कारण, उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद हजारों लोग अयोध्या पहुंच गए थे। दूसरी तरफ हिंदुओं के गुस्से और केंद्र में आ चुकी चंद्रशेखर सरकार के साथ होने पर भी उन्हें जनता के कड़े रुख का सामना करना पड़ रहा था।
विहिप के आह्वान पर देश भर से अयोध्या पहुंचकर लोगों ने 6 नवंबर 1991 से सत्याग्रह कर गिरफ्तारियां देनी शुरू कर दीं। इस सत्याग्रह में कारसेवकों की मौत से पनपे आक्रोश को देखते हुए संघ की योजना पर विहिप के तत्कालीन महामंत्री अशोक सिंघल ने उनके अस्थिकलश को देशभर में घुमाकर उनका पूजन कराने का कार्यक्रम बनाया। यह रणनीति सफल रही।
यूपी में इन अस्थिकलशों के पूजन कार्यक्रमों में जुट रही भीड़ बेहिचक और बेखौफ होकर मुलायम के खिलाफ गुस्सा जताने लगी थी। नारेबाजी भी शुरू हो गई थी और लोग मुलायम को ‘मुल्ला मुलायम’ तक कहने में न डर महसूस कर रहे थे और न संकोच।
कारसेवकों के अस्थिकलश के रथों को देश का भ्रमण करते-करते दो महीने से ऊपर हो चुके थे। प्रयागराज में संगम तट पर माघ मेला शुरू हो चुका था। विहिप ने संतों के परामर्श से मकर संक्रांति 14 जनवरी 1991 को संगम में कारसेवकों की अस्थियां प्रवाहित की और वहीं पर संकल्प लिया कि जब तक राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण शुरू नहीं हो जाता तब तक वे चैन से नहीं बैठेंगे।
दिल्ली के साथ यूपी में भी सियासी परिदृश्य बदल चुका था। बोफोर्स तोपों की खरीद में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जिस कांग्रेस के खिलाफ अभियान चलाकर मुलायम सिंह यादव ने भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई थी, अब उसी कांग्रेस के समर्थन से सरकार चला रहे थे। अयोध्या के मुद्दे पर भाजपा विरोध में खड़ी हो चुकी थी।
उधर, अस्थिकलशों के भ्रमण में उमड़े लोगों ने विहिप और संतों को मंदिर पर अपनी मुहिम आगे बढ़ाने की ताकत दे दी। दिल्ली के वोट क्लब पर 4 अप्रैल 1991 को विशाल हिंदू रैली आयोजित की गई। मंदिर मुद्दे पर देश भर से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। इसी बीच कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया तो मुलायम सरकार गिर गई। मध्यावधि चुनाव हुए और भाजपा की सरकार बनी।
भाजपा की जीत और कल्याण की सरकार बनने के साथ ही हिंदुओं और संतों की मंदिर निर्माण की आकांक्षा ने तूल पकड़ लिया। ऐसा होना लाजिमी था, क्योंकि उनके अपने बीच से ही कल्याण के रूप में एक कारसेवक ने सरकार का नेतृत्व संभाला था।
आस्थावान आकांक्षी हिंदू और संत कानूनी पेंच व बाधाओं की परवाह किए बिना श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर निर्माण शुरू होने का इंतजार करने लगे। उनकी जुबान पर बस एक ही सवाल था कि प्रदेश में भाजपा सरकार आ गई है तो मंदिर निर्माण में देरी क्यों? भाजपा भी लोगों के मनोभावों को समझ रही थी। पर, रास्ते में कई सांविधानिक और कानूनी बाधाएं खड़ी थीं। इनको हटाए बिना या वैकल्पिक रास्ता तलाशे बिना आगे बढ़ना मुश्किल था।