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60 ट्रेनों में नहीं है पैंट्रीकार, अवैध वेंडरों के भरोसे यात्री, मनमाने रेट पर सामान खरीदने को मजबूर

Mon, 23 Sep 2019 04:21 PM IST
लखनऊ ब्यूरो नीरज अंबुज/अमर उजाला, लखनऊ
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अवैध वेंडर - फोटो : amar ujala
आप जम्मू, मुंबई या चेन्नई की यात्रा कर रहे हैं तो बेहतर है कि घर से ही खाना लेकर निकलें। लंबी दूरी की 60 ऐसी ट्रेनें हैं, जिनमें पैंट्रीकार नहीं है। इनमें 75 हजार यात्री चाय से खाने तक के लिए वेंडरों पर निर्भर हैं। पुष्पक, काशी विश्वनाथ, अमरनाथ एक्सप्रेस, राप्तीसागर, गोरखपुर-एलटीटी, शताब्दी जैसी ट्रेनों में पैंट्रीकार से खाना सप्लाई किया जाता है, लेकिन उत्तर व पूर्वोत्तर रेलवे के चारबाग व लखनऊ जंक्शन सहित अन्य स्टेशनों से रवाना होने वाली लंबी दूरी की करीब 60 ट्रेनों में पैंट्रीकार नहीं है।
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अवैध वेंडर - फोटो : amar ujala
पुष्पक, काशी विश्वनाथ, अमरनाथ एक्सप्रेस, राप्तीसागर, गोरखपुर-एलटीटी, शताब्दी जैसी ट्रेनों में पैंट्रीकार से खाना सप्लाई किया जाता है, लेकिन उत्तर व पूर्वोत्तर रेलवे के चारबाग व लखनऊ जंक्शन सहित अन्य स्टेशनों से रवाना होने वाली लंबी दूरी की करीब 60 ट्रेनों में पैंट्रीकार नहीं है। यह स्थिति तब है, जबकि ट्रेनों में पैंट्री की मांग लगातार उठती रही है। रेलवे अधिकारी भले ही दलील देते रहें कि ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा है, पर हकीकत इससे इतर है। लंबी दूरी की ट्रेनों में पानी से लेकर दिन व रात के खाने तक के लिए यात्री अवैध वेंडरों के भरोसे रहते हैं।
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संसद में भी उठ चुका है मसला
ट्रेनों में पैंट्रीकार नहीं होने का मामला राज्यसभा में भी उठा चुका है। देश में 342 ऐसी ट्रेनें हैं, जो हजार किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करती हैं और उसमें पैंट्रीकार नहीं हैं। वहीं रेलमंत्री पीयूष गोयल ने इस पर बताया था कि जिनमें पैंट्रीकार नहीं है, उसमें ट्रेन साइड वेंडिंग, कैटरिंग यूनिटों व ई-कैटरिंग से खाना मुहैया कराया जा रहा है। पर, हकीकत में पैसेंजर अवैध वेंडरों के भरोसे ही सफर करते हैं।

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ट्रेनाें में अवैध वेंडरों के मिलते हैं स्टीकर
कई ट्रेनों में तो प्राइवेट सर्विसेज चल रही हैं। बाकायदा बोगियों में स्टीकर तक चिपकाए जाते हैं और पैम्फलेट भी बांटे जाते हैं। स्टेशनों पर ट्रेन के रुकते ही वेंडर ऑर्डर लेने आ जाते हैं। इन वेंडरों का रेलवे से कोई लेना-देना नहीं। वहीं स्टेशनों पर काम कर रही खानपान से जुड़ी यूनिटें भी अवैध वेंडरिंग करवाती हैं। चारबाग स्टेशन पर कमसम रेस्टोरेंट के ऐसे ही कर्मचारी हाल में बगैर अनुमति ट्रेनों में खाना बेचते हुए पकड़े गए थे।
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इन ट्रेनों में पैंट्रीकार की मांग
गोरखपुर-पुणे एक्सप्रेस (15029), लखनऊ जंक्शन-पुणे (12104), लखनऊ-पुणे (11408), गोरखपुर-अहमदाबाद (19410), बेगमपुरा (12237), गोरखपुर-पनवेल (15065), गोरखपुर-एलटीटी (11080), लखनऊ-चेन्नई एक्सप्रेस (16094), लखनऊ-यशवंतपुर (12540), हावड़ा-अमृतसर (13049), गोरखपुर-यशवंतपुर (15015), लखनऊ-जंक्शन बांद्रा टर्मिनस (19022), गोरखपुर-बांद्रा (15067), गोरखपुर-एलटीटी (15063) सहित 60 ट्रेनों में पैंट्रीकार नहीं है।
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अधूरी रह गई न्यू कैटरिंग पॉलिसी
रेलवे बोर्ड की ओर से पैसेंजरों की सुविधा के लिए न्यू कैटरिंग पॉलिसी लाई गई थी, जिसके तहत खानपान के लिए बेस किचन बनाकर ट्रेनों में सप्लाई की जानी थी। इसमें खाना बनाने व उसका वितरण करने की जिम्मेदारी अलग-अलग होनी थी। ट्रेन साइड वेंडिंग भी शुरू होनी थी। पर, यह पॉलिसी पूरी तरह से लागू नहीं की जा सकी, जिससे यात्रियों को राहत नहीं मिल पा रही है।
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...तो इसलिए बच रही है रेलवे
दरअसल, रेलवे ट्रेनों से पैंट्रीकार का सिस्टम ही खत्म करने की तैयारी कर रहा है। हालांकि, वैकल्पिक व्यवस्था खड़ी नहीं होने तक पैंट्री ही चलाई जाएंगी। पर, पैंट्री होने से रेलवे को मुनाफा कम और नुकसान अधिक होता है। मसलन, पैंट्रीकार मालिक कोई भी हो, खानपान की शिकायतों पर लगाम नहीं लगती। ओवरचार्जिंग की भी शिकायतें रहती हैं और जब मामले फोरम या कोर्ट तक पहुंचते हैं तो भरपाई रेलवे को करनी पड़ती है और उसकी छवि भी धूमिल होती है। इसलिए रेलवे पैंट्रीकार लगाने से ही बचती है।

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बदहाल है खानपान की व्यवस्था
ट्रेनों में खानपान की स्थिति बहुत ही बदहाल है। खासकर लंबी दूरी की ट्रेनों में तो पैंट्री नहीं होने से अवैध वेंडरों पर ही पूरा दारोमदार रहता है। वे मनमाने रेट पर घटिया खाना बेचते हैं। इससे पैसेंजरों के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इसलिए रेलवे को वैकल्पिक व्यवस्थाएं करनी चाहिए। - एसएस उप्पल, अध्यक्ष, पैसेंजर एसोसिएशन
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जहां पैंट्रीकार नहीं, वहां मील्स ऑन व्हील्स
लंबी दूरी की जिन ट्रेनों में पैंट्रीकार नहीं है, उनमें यात्रियों के लिए मील्स ऑन व्हील्स है। वैसे तो अवैध वेंडरिंग पर काफी हद तक लगाम लग गई है। इसके बावजूद ट्रेनों व स्टेशनों पर लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं, ताकि यात्रियों को बेहतर खाने की सप्लाई हो सके। - संजय त्रिपाठी, डीआरएम, उत्तर रेलवे
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