लखनऊ। साहित्य के शलाका पुरुष डॉ. नामवर सिंह के जाने से भले ही साहित्य जगत में सन्नाटा पसर गया हो, लेकिन उनसे जुड़े लोगों में उनकी यादें हमेशा जिंदा रहेगी। कभी उनकी क्लास में पढ़ाई कर चुके सीनियर आईएएस डॉ. हरिओम बताते हैं कि उनकी क्लास में सवालों को पूछने की आजादी थी तो आलोचना करने की भी आजादी थी। वो पूरी बात सुनते थे तब कुछ बोलते थे। ‘अमर उजाला’ से हुई बातचीत में डॉ. हरिओम ने बताया कि वे 1992 से 1997 तक जेएनयू में अध्ययनरत रहे।
मेरे अध्ययनकाल के दौरान डॉ. नामवर सिंह विजिटिंग प्रोफेसर थे और वह हमें हिंदी आलोचना, छायावाद हिंदी साहित्य पढ़ाते थे। वह समय के पाबंद होने के साथ क्लास में पूछे जाने वाले स्टूडेंट के हर सवाल को गौर से सुनते थे। सवाल पूछने की इतनी आजादी थी कि उनकी क्लास में सभी स्टूडेंट्स सवाल तैयार करके रखते थे। वह किसी मसले की आलोचना भी पूरी सुनते थे। प्रशासनिक सेवा में आने के बाद भी उनसे मिलना-जुलना जारी रहा। गोरखपुर में जब मैं बतौर डीएम तैनात था, तब एक आयोजन में उनसे मुलाकात हुई। सेमिनार के बाद कवि सम्मेलन भी हुआ। मैंने कुछ रचनाएं भी पढ़ीं। उनके जाने के साथ निश्चित तौर पर बहुत ही सरल शब्दों में आलोचना को स्वरूप देने वाले एक बड़े नाम से अब साहित्य जगत अधूरा हुआ है।
बहुत सुनने के बाद तोलकर बोलते थे डॉ. नामवर सिंह
उप्र हिंदी संस्थान के पूर्व निदेशक और लेखक डॉ. सुधाकर अदीब ने बताया कि वेशभूषा-व्यवहार से वह भले ही दक्षिणपंथी दिखते थे, लेकिन विचारधारा बिल्कुल अलग थी। डॉ. अदीब ने बताया कि वर्ष 2014 में जयपुर में उनसे मुलाकात के बाद वर्ष 2015 में उनके आवास पर जाकर मुलाकात हुई। वे जितना सहज और सामान्य बाहर से नजर आते थे, उतने ही वे अंदर से भी थे। अपने उपन्यास के विमोचन के लिए उनसे दिल्ली के आवास पर मिलना हुआ। जहां ऊपर चढ़कर जाना पड़ता था। वहां देखा तो बिस्तर के अलावा चारों ओर किताबें और पत्रिकाएं रखीं थीं। उन्होंने मुझे कुर्सी पर बैठने को कहकर काफी देर तक उपन्यास पढ़ा, समझा, उसके बाद विमोचन को राजी हुए। बाद में साहित्य अकादमी में उपन्यास का विमोचन हुआ। वे एक तो बहुत सुनने के बाद बहुत ही कम और तोलकर बोलते थे। उनकी अभिव्यक्ति में गहन चिंतन की झलक दिखती थी। अब उनके जैसे बड़े कद का साहित्यकार शायद ही हो सके।
साहित्यकारों को ऐसा लग रहा है कि जैसे अपने अभिभावक की मृत्यु हुई हो
लेखिका-कथाकार किरन सिंह ने बताया कि मुझे दिल्ली के एक घर और दफ्तर का पता मुंह जुबानी याद है। पहला 32 ए-शिवालिक अपार्टमेंट, नामवर जी का घर और दूसरा 2/36 अंसारी रोड, दरियागंज, हंस पत्रिका दफ्तर, जहां राजेंद्र यादव से मिलना होता था। नामवर जी के जाने के बाद सभी साहित्यकारों को ऐसा लग रहा है जैसे उनके अपने अभिभावक की मृत्यु हुई हो। वे इतनी आत्मीयता और अपनेपन से मिलते थे कि सभी को लगता था कि नामवर जी उसके अपने हैं। उनसे जब बात होती तो वे पूछते मैंने कौन सी किताब पढ़ी है और उस किताब में क्या है, इसी पर बात होती थी। उनके जाने के बाद हिंदी आलोचना का क्या होगा ? इसकी चिंता बढ़ गई है।
आलोचना के एक युग का अवसान
लेखक व आलोचक नलिन रंजन सिंह ने बताया कि नामवर सिंह आलोचना के शिखर पुरुष थे। उनके जैसा अध्यवसायी होना विरल है। उन्होंने पौर्वात्य और पाश्चात्य दोनों तरह के साहित्य का गहन अध्ययन किया था। साहित्य जगत के लिए उनका जाना एक युग के जाने की तरह है। साहित्य जगत के अलावा व्यक्तिगत रूप से यह मेरी निजी क्षति है। कविता और कहानी को लेकर उनके प्रतिमान आज भी स्वीकार्य हैं। एक संवादी आलोचक होने के कारण उन्होंने आलोचना की वाचिक परंपरा का भी विकास किया। प्रत्युत्पन्न मष्तिष्क का धनी भाषा को अपने हिसाब से निर्झर शैली में प्रवाहित करने वाला ऐसा आलोचक हिंदी साहित्य के इतिहास में सदैव अमर रहेगा।
नामवर जी की स्मृति में शोकसभा आज
नगर के चिंतकों, विचारकों और लेखकों की ओर से बृहस्पतिवार को डॉ. नामवर सिंह की स्मृति में शोकसभा का आयोजन किया जाएगा। इप्टा के राकेश ने बताया कि शोकसभा निशातगंज स्थित कैफी आजमी अकादमी में शाम चार बजे से होगी।
नामवर सिंह को भूला हिंदी संस्थान
मौजूदा दौर में साहित्य केसबसे बड़े नाम रहे नामवर सिंह के निधन केबाद प्रदेश केउप्र हिंदी संस्थान की ओर से शोक संदेश शोक सभा तक नहीं हो सकी। नामवर सिंह को हिंदी संस्थान की ओर से कई बड़े पुरस्कारों सम्मानों से नवाजा जा चुका है। लेकिन बुधवार शाम तक संस्थान परिसर में श्रद्धांजलि आदि नहीं होने की सूचना रही। पूछने पर संस्थान के आला अधिकारियों की ओर से बताया गया कि जल्द ही शोक सभा की जायेगी।