लखनऊ। राजधानी लखनऊ को जल्द ही प्रदेश के पहले पुरातत्व संग्रहालय की सौगात मिलने जा रही है। इस संग्रहालय में करीब 3000 वर्ष पुरानी सभ्यताओं को न केवल देखा बल्कि समझा भी जा सकेगा। मोहनलालगंज स्थित हुलासखेड़ा उत्खनित पुरास्थल से प्राप्त औजारों, मूर्तियों और अन्य ऐतिहासिक धरोहरों को यहां प्रदर्शित किया जाएगा।
उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना का प्रस्ताव भारत सरकार को भेज दिया है। अनुमति मिलते ही संग्रहालय निर्माण का कार्य शुरू कर दिया जाएगा। प्रस्तावित संग्रहालय लगभग 40 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होगा।
राज्य पुरातत्व निदेशालय की निदेशक रेनू द्विवेदी ने बताया कि मोहनलालगंज क्षेत्र में फैला 84 एकड़ का हुलासखेड़ा पुराना टीला प्रदेश की प्राचीन सभ्यताओं का महत्वपूर्ण साक्ष्य है। यहां संरक्षण और अनुरक्षण का कार्य लगातार जारी है। हुलासखेड़ा तक पहुंच को आसान बनाने के लिए लोक निर्माण विभाग द्वारा सड़क निर्माण भी कराया जाएगा, जिसकी एनओसी पहले ही जारी की जा चुकी है।
उन्होंने बताया कि उत्खनन में सामने आए ट्रेंच स्ट्रक्चर की केमिकल क्लीनिंग, स्ट्रेंथनिंग, अंडरपिनिंग, फ्लोरिंग और ब्रिक ऑन एज जैसे संरक्षण कार्य प्रगति पर हैं। इन सभी कार्यों को फरवरी तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
कार्तिकेय की स्वर्ण प्रतिमा होगी आकर्षण का केंद्र
प्रस्तावित पुरातत्व संग्रहालय में 1800 वर्ष पुरानी मिट्टी की मूर्तियों का दुर्लभ संग्रह प्रदर्शित किया जाएगा। इसमें उत्खनन से प्राप्त शुंगकालीन मृण्मूर्तियां (मिट्टी की मूर्तियां), कुषाण एवं गुप्तकालीन आवासीय संरचनाएं, प्राचीन गलियों के दृश्य और उत्खनित ट्रेंच शामिल होंगे। साथ ही संग्रहालय में कार्तिकेय की स्वर्ण प्रतिमा, कुषाणकालीन मृण्मूर्तियां, चांदी व तांबे के सिक्के, गुप्तलिपि की मुहरें, हाथीदांत की कंघी, लोहे की अंडाकार वस्तुएं और हड्डी से बने औजार भी प्रदर्शित किए जाएंगे। ये सभी अवशेष उस दौर की समृद्ध सभ्यता और जीवनशैली की झलक पेश करेंगे।