अतरौली सीट पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सीट है। कई दशक के बाद यह पहला मौका है, जब अतरौली सीट पर उनके बिना चुनाव होने जा रहा है। हालांकि, उनके परिवार की इस पारंपरिक सीट पर गहरी पैठ है। मगर, सपा को भी कमजोर नहीं माना जा सकता। क्योंकि, 2012 के चुनाव में सपा के वीरेश यादव ने कल्याण सिंह की पुत्रवधू को चुनाव हराया था। यहां भी मुद्दों के साथ जातीय समीकरण हावी रहते हैं। अतरौली चौराहे पर मिले क्षेत्र के चौ. नरेंद्र सिंह व बहादुर सिंह कहते हैं, यहां किसानों से जुड़ी समस्याओं के साथ ही चेहरे के दम पर वोट पड़ेंगे। वहीं, उदयवीर सिंह बघेल चर्चा छिड़ते ही अतरौली-छर्रा सीट पर छुट्टा जानवरों से हो रहे नुकसान का हवाला देते हुए विषयांतर कर देते हैं। बेरोजगारी के सवाल पर बुड्डा शर्मा भी सभी को घेरते नजर आए। बहरहाल, यहां भी भाजपा को चुनौती सपा से चुनौती मिल रही है। बसपा व कांग्रेस भी अपना जोर लगाए हुए हैं।
राजा बनाम चरण सिंह बन रहा बड़ा मुद्दा
जिन्ना को लेकर हमलावर भाजपा राजा महेंद्र प्रताप का नाम और उनके नाम के विश्वविद्यालय की स्थापना को अपनी उपलब्धि में शामिल कर रही है। वहीं, रालोद-सपा चौ. चरण सिंह को सम्मान न देने का आरोप लगाते हुए भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। इसे लेकर इगलास व खैर सीट से जुड़े ठा. शीलेंद्र सिंह व चौ. जगवीर सिंह कहते हैं कि इन दोनों विषयों का सीटों पर असर दिखाई दे रहा है। परिणाम चुनाव में ही दिखेगा।
कासगंज : तीनों सीटों पर सपा से मिल रही चुनौती
कासगंज जनपद में तीन सीटें-कासगंज, अमापुर और पटियाली हैं। तीनों पर भाजपा का कब्जा है। सपा यहां सीधे टक्कर में है। लोध, ठाकुर, यादव बहुल इन सीटों का अपना-अपना मिजाज है। वेदराम वर्मा कहते हैं, कासगंज को एक ऐसा चेहरा चाहिए जो कभी किसी विवाद में न रहा हो। भाजपा सरकार ने सोरोंजी को तीर्थ स्थल घोषित किया। यह बड़ी उपलब्धि है, लेकिन बाढ़ के मुद्दे को भी ध्यान में रखना चाहिए था। वे बताते हैं, लोध बहुल सीट पर अन्य जातियां भी निर्णायक भूमिका में रही हैं। इस बार क्षेत्र के यादव-मुस्लिमों का रुझान सपा की ओर है। अमापुर सीट की चर्चा छिड़ते ही भगवान सिंह राघव कहते हैं, लोध, ठाकुर व शाक्य बहुल इस सीट पर भाजपा और सपा में सीधी टक्कर है। पर, यह भी सच है कि यहां चेहरे हावी रहते हैं। पटियाली सीट को लेकर कुशपाल सिंह कहते हैं, लोधी, शाक्य, ठाकुर व मुस्लिम बहुल इस सीट पर चेहरा बहुत असर करता है। जातीय समीकरण भी चुनाव में हावी रहता है। बहरहाल, भाजपा-सपा में सीधी टक्कर है, जबकि अनुसूचित मतों के सहारे बसपा भी दम भर रही है।
बरौली व छर्रा : गठबंधन से मिल रही कड़ी टक्कर
अलीगढ़ जिले की ठाकुर बहुल बरौली व छर्रा सीट को लेकर नगर निगम के बाहर चाय की दुकान पर चर्चा चल रही थी। यहीं मिले हरदुआगंज के ठा. संदीप जादौन, विपिन चौधरी ने बताया कि पिछला चुनाव बेशक मोदी लहर के दम पर जीता गया, पर इस बार अभी कुछ कहना मुश्किल है। भाजपा को दोनों सीटों पर सपा-रालोद गठबंधन से टक्कर मिलने के आसार हैं। बसपा व कांग्रेस भी अपना जोर लगाए हुए हैं। वे कहते हैं, यह बात अलग है कि जिले में केंद्र व प्रदेश की योजनाओं के तहत डिफेंस कॉरिडोर, राजा महेंद्र प्रताप विश्वविद्यालय जैसे उल्लेखनीय काम हुए हैं। मगर, जनप्रनिधियों की सिफारिश पर भी सुनवाई न होना भी यहां मुद्दा है। वहीं, अनूप शर्मा बरौली में चेहरे और स्थानीय मुद्दे को ही प्रभावी बताते हैं। बरौली में साथा मिल भी एक मुद्दा है। यहां भाजपा को बसपा और सपा चुनौती देती दिख रही हैं। हालांकि, यहां अभी तक दो सियासी धुर विरोधियों विधायक ठा. दलवीर सिंह व पूर्व मंत्री ठा. जयवीर सिंह में भाजपा से ही टिकट को लेकर जोरदार जोर-आजमाइश चल रही है।
एटा : काम के पैमाने पर सबको आंक रहे लोग
जिले की चार सीटों-अलीगंज, एटा, मारहरा व जलेसर पर भाजपा का कब्जा है। 2017 के चुनाव में भी इस जिले में चारों सीटें जीतने वाली भाजपा की सीधी टक्कर सपा से मिली थी। कमोबेश अब भी वैसा ही माहौल बन रहा है। यादव बहुल एटा, लोधी बहुल मारहरा, यादव बहुल अलीगंज, यादव और अनुसूचित जाति बहुल जलेसर सीट पर जातीय समीकरण, चेहरे, स्थानीय मुद्दे इस चुनाव में बड़ा प्रभाव डालने को तैयार हैं। जीटी रोड स्थित मेडिकल कॉलेज के पास एक टी स्टॉल पर चाय की चुस्कियां लेते मिले शहर के ही रमेशपाल कहते हैं, जिले में विकास के कई काम हुए। सबसे बड़ी उपलब्धि मेडिकल कॉलेज है। इसके अलावा जीटी रोड पर बाईपास से भी लोगों को काफी सुकून मिला। बात काटते हुए विक्रांत ने कहा कि ये दोनों ही काम केंद्र सरकार के हैं। राज्य सरकार से जिले को क्या मिला? सपा के शासनकाल में एटा को प्राथमिकता दी जाती थी। छात्र माधव का कहना था, रोजगार के मामले में जो पार्टी काम करेगी, उसको ही युवा पसंद करेंगे। बुजुर्ग राधेश्याम बोले, सरकार ने वृद्धावस्था सहित अन्य सभी पेंशन का पैसा बढ़ा दिया है। राशन भी मुफ्त मिल रहा है। इसीलिए सरकार दोबारा बनवाएंगे।
हाथरस : जातीय समीकरणों से लड़ाई होगी दिलचस्प
हाथरस जिले की सदर, सिकंदराराऊ सीट पर 2017 में भाजपा जीती थी। सिर्फ सादाबाद सीट पर बसपा से रामवीर उपाध्याय जीते थे। फिलहाल वे बसपा से निष्कासित हैं। उनका परिवार भाजपा में है। सदर सीट पर ब्राह्मण, वैश्य व अनुसूचित जातियों का बाहुल्य है। अलीगढ़ रोड पर चाय की चुस्कियां लेते मिले रामकिशन शर्मा कहते हैं, अपराध कम हुआ है। यही भाजपा कह रही है और हम भी इसे मानतेे हैं। पर, विकास के पैमाने पर आंकें तो सही मायने में अभी बहुत कमी है। यही बात जोड़ते हुए एडवोकेट दिगंबर सिंह सिसौदिया कहते हैं, छुट्टा जानवरों की समस्या से निजात नहीं मिली। आलू किसानों की भी समस्याओं का हल नहीं निकला। एससी आरक्षित सदर सीट पर भाजपा विकास के नाम पर मजबूत दावा कर रही है। विपक्ष सपा व बसपा सरकार की नाकामियों के सहारे आगे बढ़ रहा है। ठाकुर, यादव, मुस्लिम व अन्य पिछड़ा वर्ग मतदाता बहुल सिकंदराराऊ सीट पर पिछड़ा वोटों का ध्रुवीकरण भाजपा सहित सभी विपक्षी दलों की धड़कनें बढ़ाए हुए है। यहां विकास से ज्यादा चेहरा, स्थानीय प्रत्याशी और स्थानीय मुद्दे महत्व रखते है। सादाबाद की बात करें तो रालोद-सपा गठबंधन जातीय समीकरणों के सहारे भाजपा को तगड़ी चुनौती दे रहा है।