लखनऊ। सेंट्रल बार एसोसिएशन ने बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के प्रस्ताव को अधिकार-क्षेत्र से बाहर और नैसर्गिक न्याय के विरुद्ध बताते हुए खारिज कर दिया है। सेंट्रल बार के महामंत्री अवनीश दीक्षित ने बार काउंसिल के सचिव, प्रयागराज को पत्र भेजकर कहा कि एसोसिएशन की कार्यकारिणी ने 27 अगस्त को आपात बैठक कर सर्वसम्मति से काउंसिल के पत्र को स्वीकार न करने का निर्णय लिया है।
पत्र में कहा गया है कि उप्र बार काउंसिल का 23 फरवरी 2025 का प्रस्ताव और 27 अगस्त 2025/2026 के पत्र ''पेटेंट वांट ऑफ जूरिडिक्शन'' से ग्रस्त और ''अल्ट्रा वायर्स'' हैं। अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा-6 के तहत राज्य विधिज्ञ परिषद को सेंट्रल बार के आंतरिक मामलों में इस तरह हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। सेंट्रल बार का आरोप है कि प्रस्ताव हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में लंबित रिट याचिका में 23 अगस्त को पारित आदेश के विपरीत और एसोसिएशन को सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित किया गया।
सेंट्रल बार ने चेतावनी दी है कि प्रस्ताव वापस या स्थगित नहीं किया गया तो उसे हाईकोर्ट में चुनौती दी जाएगी। एसोसिएशन ने बार काउंसिल के आदेशों को मानने से भी इन्कार किया है और कहा है कि 20 फरवरी 2026 की आम सभा में पारित संशोधन अब भी प्रभावी है।
ये है मामला
बीते दिनों बार
काउंसिल ने पत्र लिखकर सेंट्रल बार को निर्देश देते हुए कहा था कि सिविल कोर्ट लखनऊ के अधिवक्ता अक्षत द्विवेदी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर सेंट्रल बार की वर्तमान कार्यकारिणी का कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद उसे बढ़ाए जाने को चुनौती दी थी। याचिका में 20 फरवरी की आम सभा में कोषाध्यक्ष और कनिष्ठ उपाध्यक्ष के पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए जाने का मुद्दा भी उठाया गया था।
इस पर बार काउंसिल ने निर्णय लिया कि आम सभा के प्रस्ताव मॉडल बायलॉज के विपरीत हैं। काउंसिल ने कार्यकारिणी को एक सप्ताह में परमानंद श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली एल्डर्स कमेटी को कार्यभार सौंपने और कमेटी को एक माह में मॉडल बायलॉज के अनुसार चुनाव कराने का निर्देश दिया था। काउंसिल ने ये भी कहा था कि चुनावी प्रक्रिया में अगर एसोसिएशन का कोई सदस्य या वकील किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न करता है तो चेयरमैन इसकी जानकारी तुरंत बार काउंसिल को दें, जिससे ऐसे सदस्य या वकील के खिलाफ कार्रवाई की जा सके।