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हाईकोर्ट का आदेशः 40 साल पहले नौकरी से निकाली गई टीचर को दें पूरा वेतन

Tue, 07 Feb 2017 03:25 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
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43 साल पहले बीटीसी न होने की वजह से नौकरी से निकाली गई सहायक अध्यापिका को राहत देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने बेसिक शिक्षा विभाग को आदेश दिए हैं कि वह उसे पूरे सेवाकाल का वेतन और अन्य देय सुविधाएं प्रदान करे।
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यह राशि गलत वजहों से याची को नौकरी से निकालने वाले अधिकारियों से वसूल करने की छूट विभाग को दी गई है। याची को बतौर हर्जाना 25 हजार रुपये देने के निर्देश भी हाईकोर्ट ने दिए हैं।

याची राजमति सिंह ने हाईकोर्ट को बताया था कि 25 जनवरी 1971 को वे रायबरेली के जगतपुर ब्लॉक की कन्या जूनियर हाईस्कूल, गौरा में सहायक अध्यापिका नियुक्त हुई थीं। 
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इस बीच यूपी बेसिक शिक्षा अधिनियम 1972 अस्तित्व में आया और जिला पंचायतों के अधीन स्कूलों को बेसिक शिक्षा बोर्ड को हस्तांतरित किया गया। वहीं राजमति को सत्र 1973-74 में बीएड करने के लिए रायबरेली के तत्कालीन जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने अध्ययन अवकाश दिए। 

वह तीन जुलाई 1974 को नियुक्ति के लिए लौटीं तो इस आधार पर जॉइन करने से रोका गया कि उन्हें बीएड नहीं, बीटीसी के लिए अध्ययन अवकाश दिया गया था। अधिकारी ने उनकी सेवाएं भी समाप्त कर दीं। 

राजमति ने विभाग में अपनी शिकायत रखी, जिसे 35 साल बाद चार जून 2009 को खारिज कर दिया गया। राज्य लोकसेवा ट्रिब्यूनल में राजमति ने शिकायत की, यहां उसे आंशिक राहत दी और कहा कि राजमति को नौकरी से निकालना गलत था, लेकिन यह भी कहा कि जिस अवधि में उन्होंने काम नहीं किया, उसके लिए वे किसी वेतन की हकदार नहीं होंगी। 

ट्रिब्यूनल ने विभाग के निर्णय को अस्वीकार करते हुए कहा कि मौखिक आदेश से अध्यापिका को नहीं निकाला जा सकता। राजमति ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें दावा किया कि उसे लिखित आदेश पर नौकरी दी गई, मौखिक आदेश पर निकाला नहीं जा सकता।  वह अपनी सेवाएं नहीं दे सकी तो इसकी वजह विभाग द्वारा उसे बीएड के अध्ययन अवकाश देना और फिर कोर्स के बाद उसे जॉइन नहीं करने देना थी। 
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विभाग की गलती, याची को भुगतना पड़ा

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जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस रविंद्रनाथ मिश्रा - द्वितीय ने अपने निर्णय में कहा कि विभाग द्वारा याची को अध्ययन अवकाश के आदेश दिए गए थे, इसे उसका सेवाकाल खत्म नहीं माना जा सकता। 

उसे इस दौरान वेतन मिलना चाहिए। जिला पंचायत द्वारा की गई उसकी नियुक्ति किसी लिहाज से गैरकानूनी नहीं थी। वहीं अधिनियम बनने के बाद भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं था कि पहले से नौकरी कर रहे अध्यापक को बीटीसी या कोई समकक्ष कोर्स करने पर ही विभाग के अधीन आ चुके स्कूल में पढ़ाने दिया जाता। 

बल्कि सरकार समय-समय पर आदेश निकाल कर साफ कर चुकी है कि जो अध्यापक बीटीसी या अन्य समकक्ष ट्रेनिंग नहीं पाए हैं, उन्हें अप्रशिक्षित शिक्षक का वेतनमान मिलेगा। विभाग ने याची की शिकायत पर तीन दशक के बाद निर्णय लिया, जो उसका ढीला रवैया दिखाता है।

अधिकारियों को याची की शिकायत की परवाह थी ही नहीं। हाईकोर्ट ने कहा, दुर्भाग्य से ट्रिब्यूनल ने भी गौर नहीं किया कि 1971 में नियुक्ति के समय याची पर बीटीसी की शर्त नहीं थी।

याची को बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा सेवा में जॉइन करने से रोकना गैर कानूनी और निरंकुश निर्णय था। गलती विभाग की है, याची को भुगतना पड़ा। उसे उसके सेवाकाल का वेतन देने से इन्कार नहीं किया जा सकता।

‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत यहां नहीं चलेगा क्योंकि याची को कर्मचारी होते हुए भी काम करने से अन्यायपूर्ण ढंग से रोका गया। हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका स्वीकार की जाती है और ट्रिब्यूनल के आदेश में बदलाव करते हुए याची को उसके समस्त सेवाकाल का वेतन और अन्य संबंधित भुगतान दिए जाएं।

साथ ही विभाग को छूट दी जाती है कि वह चाहे तो जांच करवाकर बेसिक शिक्षा विभाग के उन अधिकारी या अधिकारियों की पहचान करवा सकता है जो इन परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार हैं। उन्हीं से समस्त राशि वसूल करवाई जा सकती है। वहीं याची को हर्जाने के तौर पर 25 हजार रुपये भी दिए जाएं। 
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