15 लाख कॉपियां और जांचने वाले सिर्फ 15 सौ। प्रदेश के राजकीय पॉलीटेक्निक संस्थानों की यही स्थिति है।
15 सौ शिक्षकों पर पॉलीटेक्निक के तीनों वर्ष के स्टूडेंट्स की 15 लाख कॉपियां जांचने की जिम्मेदारी होती है।
5 सौ में भी सारे शिक्षक कॉपी जांचने नहीं पहुंच पाते। इसका नतीजा पॉलीटेक्निक रिजल्ट में देरी और गड़बड़ी के रूप में सामने आता है।
प्रदेश के राजकीय और सहायता प्राप्त पॉलीटेक्निक संस्थानों में शिक्षकों की भारी कमी है। कॉपी जांचने के काम में केवल राजकीय और सहायता प्राप्त पॉलीटेक्निक के शिक्षकों को ही लगाया जाता है।
इस समय प्रदेश के 18 अनुदानित पॉलीटेक्निक संस्थानों में करीब 350 और सौ राजकीय पॉलीटेक्निक संस्थानों में करीब 900 शिक्षक हैं।
शिक्षकों की संख्या बेहद कम होने के कारण कॉपी जांचने में रिटायर्ड शिक्षकों की मदद भी ली जाती है। इनकी संख्या मुश्किल से दो-ढाई सौ हो जाती है।
इस तरह कॉपी जांचने योग्य शिक्षक मुश्किल से 15 सौ हो पाते हैं। इनमें भी सारे शिक्षकों का एक साथ कॉपी जांचने पहुंचना संभव नहीं होता है।
उत्तर पुस्तिकाओं की बात करें तो हर साल औसतन 80 हजार छात्र-छात्राएं निजी और पॉलीटेक्निक संस्थानों में दाखिला लेते हैं।
तीनों साल के छात्र-छात्राओं को मिला लिया जाए तो यह आंकड़ा दो लाख 40 हजार पहुंच जाता है। हर वर्ष स्टूडेंट्स को छह-छह पेपर देने होते हैं।
अगर हर छात्र ने एक-एक कॉपी भी लिखी तो दो लाख 40 स्टूडेंट्स के हिसाब से करीब 14-15 लाख कॉपियां हो जाएंगी।
अगर एक हजार शिक्षक भी कॉपियां जांचने पहुंचे तो भी हर शिक्षक को कम से 1500 कॉपियां जांचनी होंगी। एक शिक्षक अगर रोजाना 30 कॉपियां भी जांचेगा तो पूरी कॉपियां जांचने में कम से कम दो महीने का समय चाहिए।
इसके बाद रिजल्ट तैयार करने, घोषित करने और अंकपत्र बनवाने में भी काफी समय लगता है। प्राविधिक परीक्षा परिषद में स्टॉफ की काफी कमी है इस वजह से इन कामों को निपटाने में भी काफी समय लगता है।