अगर बच्चे को लगातार तेज बुखार आ रहा है और वह बहकी-बहकी बात कर रहा है तो उसे तुरंत डॉक्टर को दिखाई। यह लक्षण दिमागी बुखार का हो सकता है क्योंकि ऐसे में बुखार दिमाग पर हावी होने लगता है। यह कहना है डफरिन अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सलमान खान का।
वो बताते हैं कि जापानी इंसेफलाइटिस और एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम क्यूलेक्स नाम के मच्छर से पनपता है। ये मच्छर मच्छर जहां धान की खेती होती है या जलभराव अधिक होता है वहां पर पैदा होते हैं। जेई और एईएस का वायरस सुअर में पाया जाता है।
मच्छर जब इनको काटने के बाद मानव जाति के संपर्क में आते हैं तो वो मनुष्यों में इस वायरस को फैला देते हैं। बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण उनकी हालत गंभीर हो जाती है।
एक्सरसाइज से बेहतर होगा आपका बच्चा
बुखार से ठीक होने के बाद कई बार ये पता चलता है कि बच्चा सुनने और देखने की क्षमता खो चुका है। ऐसे में इस बात का ध्यान जरूरी है और ओरोमोटर एक्सरसाइज जरूरी है। बच्चे के मुंह से लगातार लार गिरती रहती है। मुंह बंद या खुला रहता है। सांस लेने में दिक्कत होती है।
पानी या खाना निगलने में दिक्कत होती है तो स्पीच पैथोलॉजिस्ट के साथ ईएनटी एक्सपर्ट की सलाह लेनी चाहिए। बच्चों के गाल पर हाथ से गोल-गोल घुमाते रहना चाहिए। गुब्बारा फुलाने के साथ सीटी बजाने के लिए लिए प्रेरित करना चाहिए जिससे वो तेजी से रिकवर करे और सामान्य जीवन जी सके।
केजीएमयू की स्पीच पैथोलॉजिस्ट डॉ. सुहानी शर्मा की मानें तो दिमागी बुखार की चपेट में आने के बाद बच्चों की समझने और पहचानने की क्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है। वो बताती हैं कि दिमाग में वायरस फैलने से बच्चों की बोलने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है जिससे मेडिकल की भाषा में बेबी टॉक्स कहते हैं।
इन बातों का रखें खास ध्यान
ऐसी स्थिति में बच्चों का शरीर पूरी तरह शिथिल पड़ जाता है और उनके हाथ पैर और गर्दन काम करना बंद कर देते हैं। ऐसे में बच्चों की रिकवरी के साथ उनके बोलने, समझने और सुनने की क्षमता को बनाए रखने के लिए नियमित ध्यान देने की जरूरत है। ऐसे में बच्चों के हाथ पैर पर हल्की मालिश के साथ आंख से देखने और कान से सुनने की जांच भी कराती रहनी चाहिए।
•डॉ. सलमान बताते हैं कि दिमागी बुखार से शरीर का तापमान तेजी से बढ़ता है। इसलिए कोल्ड स्पंजिंग यानि ठंडे पानी से शरीर को अच्छे तरीके से साफ करें।
•शरीर को ढंक कर रखने की बजाय खुले में पंखे में रखे। शरीर के तापमान के हिसाब से नियमित फ्लूयड चढ़ाया जाए जिससे उनकी हालत और गंभीर न हो।
•बुखार आने पर बच्चों को बिना डॉक्टरी सलाह के कोई भी दवा न दें। इससे हालत और बिगड़ सकती है।