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समाज में हर स्तर पर है असहिष्णुता: सुशांत सिंह

Thu, 10 Dec 2015 11:35 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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हम उन्हें ‘लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ के सुखदेव, ‘जंगल’ के आतंकवादी या ‘सहर’ के गजराज सिंह के रूप में जानते रहे हैं, लेकिन इन दिनों उनकी एक अलग पहचान बन गई है। यह पहचान है ‘सावधान इंडिया’ के सूत्रधार की। सुशांत सिंह कहते भी हैं कि मेरे पूरे कॅरिअर को एक ओर रख सकते हैं और ‘सावधान इंडिया’ को दूसरी ओर।
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तीन वर्ष से अधिक समय में अपराध पर आधारित इस धारावाहिक ने 1400 कड़ियां पूरी कर ली हैं। अब इसके नए सत्र में अतिरिक्त सतर्कता को लेकर दर्शकों को जागरूक किया गया है। सुशांत मानते हैं कि यह महज एक धारावाहिक नहीं है बल्कि इसने उन्हें समाज के लिए कुछ करने अवसर दिया है। लोग उन्हें सामाजिक कार्यकर्ता या समाज सुधारक जैसा आदर देने लगे हैं।

सुशांत बुधवार को जब लखनऊ आए तो वे ‘अमर उजाला’ के दफ्तर भी पहुंचे और देर तक बातचीत की। इस बातचीत में धारावाहिक, उनकी छवि और अभिनय यात्रा के साथ समसामयिक मुद्दे भी बार-बार चर्चा में आते रहे। बेबाक सुशांत विभिन्न सवालों पर कुछ यूं बोले....
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समाज में असहिष्णुता
हर किसी को अपने विचार व्यक्त करने का हक है। सरकार की आलोचना देश की आलोचना नहीं है। अगर देश में ऑनर किलिंग हो रही है, दो प्यार करने वालों को मौत के घाट उतार दिया जाता है, तो ये हम सबको शर्मसार करने वाली बात है। अगर केवल इस अंदेशे में की कोई बीफ खा रहा था, उसकी हत्या कर दी जाती है तो ये हम सबके लिए शर्म की बात है। असहिष्णुता समाज में हर स्तर पर है।

अगर किसी को किसी खास तरह के वस्त्र पहनने से रोका जाता है तो यह भी असहिष्णुता है। बंगलुरु में पब में घुसकर लड़के-लड़कियों को पीटा जाता है, यह क्या है? विडम्बना देखिए कि ऐसा करने वालों को टिकट देने की कोशिश की जाती है।

एंकरिंग तक ही सीमित हो जाना

मैंने कभी कॅरिअर के बारे में नहीं सोचा। यह तो मालूम है कि प्रतिभाशाली हूं और जब तक हाथ-पांव हिलते रहेंगे तब तक अभिनय करता रहूंगा। सीमित हो गया हूं यह नहीं लगता बल्कि और आजाद हो गया हूं। इस शो ने मुझे बहुत आजादी दी है, ना करने की।

अब फिल्मों में वही भूमिकाएं करना चाहता हूं जहां मुझे भी पूरा आनंद आए और दर्शक भी कह सकें कि हां यार, ऐसी वाली भूमिका नहीं देखी थी, जैसे ‘हेट स्टोरी-2’ में। ऐसी खलनायक की भूमिका मैंने नहीं की थी। अजीब भूमिका थी, शेर भी पढ़ता है खलनायक। शुरू में बड़ा अटपटा भी लगा था। मेरे जीवन का मौगेंबो यही था।

नए सीजन में नया क्या
‘सावधान इंडिया’ के नए सत्र में हमने अपने मूक संरक्षकों को खास तौर पर महत्व दिया है, जिनके प्रयासों के कारण घटनाओं से बचा जा पाता है। ये माता-पिता भी हो सकते हैं और सिक्योरिटी गार्ड भी हो सकते हैं।

नया सत्र उस सतर्कता और चिंता के प्रति हमारा अभिवादन है, जिसने बहुत सारे अपराधों से हमें बचाया है। हमने इसे ‘सावधानी आपकी, सुरक्षा आप सब की’ का नारा दिया है। अब इसे पूरे सप्ताह रात 10 बजे से देखा जा सकेगा।

लिपिस्टिक वाले सपने

मेरी आने वाली फिल्म ‘लिपिस्टिक वाले सपने’ है। प्रकाश झा की फिल्म है, जो चार नायिकाओं की कहानी है। अलग-अलग उम्र की नायिकाएं हैं, जिनका मैं पति बना हूं।

मुद्दा बहुत सामान्य सा है। इसमें बताया गया कि छोटे शहर और मध्यमवर्गीय परिवारों में महिलाओं, लड़कियों पर इतनी ज्यादा पाबंदियां हैं कि छोटे-छोटे सपने भी कैसे बहुत बड़े हो जाते हैं। फिल्‍म अगले साल जनवरी में प्रदर्शित होनी है। एक और फिल्म है ‘रेड कारीडोर’, पोस्ट प्रोडक्शन में है। ये नक्सल समस्या पर है।

मनोरंजन के पहले देशभक्ति का सबूत क्यों?
क्या केवल झंडे को सलाम करना ही देशभक्ति है? राष्ट्रगान पर खड़े होना ही केवल देशभक्ति है? क्या यह सड़क, यह जमीन क्या यह देश नहीं है? जब इस पर आप कूड़ा फेंकते हो, आप देशभक्त हो, जब आप अपने संविधान की अवहेलना करते हो, अपने कानून तोड़ते हो, ट्रैफिक नियमों को तोड़ते हो और फिर पुलिस वाले को कहते हो कि घूस लेकर मामले को रफा-दफा कर दे तो क्या आप देशभक्त हो?

मुंबई के एक मल्टीप्लेक्स में राष्ट्रगान पर एक परिवार के खड़े न होने पर विवाद उठा था, मैं पूछता हूं कि मेरे मनोरंजन के समय में देशभक्ति का प्रमाण क्यों पूछा जा रहा है। मैं अगर मनोरंजन कर दे रहा हूं और अपनी जेब से दे रहा हूं तो इस मौके पर मेरी देशभक्ति का मापदंड नहीं ढूंढा जाना चाहिए।
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लखनऊ से जुड़ी हैं कई यादें

सबसे पहली याद, 86-87 की है। हम पीडब्लूडी के गेस्ट हाउस में थे, देहरादून वापस जाना था तो हमने रिक्शा किया स्टेशन तक जाने के लिए। मैं और मेरे पिता थे। जब थोड़ी चढ़ाई आई तो हमें पता चला कि उस रिक्शा वाले का केवल एक पैर था। पिता जी उतरे रिक्शा से, फिर मैं भी उतरा। जब स्टेशन पहुंचे तो पिता जी ने उसे कुछ ज्यादा पैसे देने चाहे लेकिन उसने नहीं लिया।

जीवटता, संघर्ष, ईमानदारी, स्वाभिमान, मैंने उस रिक्शेवाले से सीखा। फिर एक बार इमामबाड़ा घूमने आए, मेरे मौसी-मौसा उन्नाव में रहते थे। वे भी आए थे। मैं बहुत छोटा था लेकिन मुझे मौसी से बहुत मोहब्बत थी। मैं मानता था कि गर्लफ्रेण्ड तो वे मेरी हैं, शादी उनकी गलती से हो गई है। हमने साथ में खूब फोटो खिचवाए, इमामबाड़ा में। वे फोटो हैं आजतक। जब नैनीताल के बिडला विद्या मंदिर में पढ़ते थे तो  तीन महीने के लिए हमें यहां मोती महल में रहना होता था क्योंकि वहां ठण्ड बहुत होती थी। खूब मजे होते थे, रविवार को गंजिग करते थे।

लखनऊ में शूटिंग भी खूब की है। ‘सावधान इंडिया’ की ही एक बार शूटिंग थीं तो रात में टुण्डे कबाब खाने चले गए थे। सोचा था कि खा कर बस वापस आ जाएंगे लेकिन लोग इतने जुट गए कि पुलिस वालों को हमें बाहर निकालना पड़ा। ‘बाबर’ फिल्म की शूटिंग थी, खूब कपड़े लिए चौक से, थोक के भाव।

सुरक्षा गार्डों को किया पुरस्कृत
सुशांत सिंह मंगलवार की रात में सावधान इंडिया की टीम के साथ लखनऊ की सड़कों पर निकल गए। उन्होंने ठंड में मुस्तैदी से डटें सुरक्षागार्डों से भेंट की। उन्होंने उनके कामकाज और सुविधाओं के बारे में पूछा। उनके साथ फोटो खिंचवाए और उन्हें चैनल की ओर से उपहार भी दिए। सुशांत ने कहा कि सुरक्षा गार्ड बहुत कम वेतन पर काम करते हैं और उनके कारण कितने ही घर और परिवार अपराध से बच जाते हैं।
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