सुप्रीम कोर्ट के आदेश से प्रदेश के छह पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवास ही नहीं, ट्रस्टों, सोसाइटीज और संस्थाओं की संपत्तियों के आवंटन भी अवैध हो गए हैं।
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पूर्व मुख्यमंत्रियों से दो माह में बंगले खाली कराए जाने हैं, वहीं ट्रस्ट, सोसाइटी से आवंटित भवनों का जल्द से जल्द कब्जा लिया जाना है। राज्य संपत्ति विभाग सोमवार देर शाम तक आदेश से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर जानकारी जुटाता रहा।
सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को वर्ष 1980 से ही आजीवन आवास की सुविधा मुहैया कराई जा रही है। इन्हें शहर के सबसे पॉश इलाकों में लंबे-चौड़े एरिया वाले सरकारी बंगले आवंटित किए गए हैं। इनका रख-रखाव सरकार करती है। पहले पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवास आवंटित करने की कोई नियमावली नहीं थी।
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अदालतों में इससे जुड़े मामले पहुंचने पर बसपा सरकार में पूर्व मुख्यमंत्री आवास आवंटन नियमावली-1997 बनाई गई। अधिकतर पूर्व मुख्यमंत्रियों को इससे पहले ही आवास आवंटित कर दिए गए। इस नियमावली को नया अधिनियम बनाकर वैधानिकता नहीं दी गई थी।
लोक प्रहरी ने इस नियमावली की वैधानिकता को ही चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने अवैधानिक मानते हुए नियमावली को निरस्त कर दिया है।
अब ये हैं विकल्प: रिव्यू पिटीशन दायर करें या कानून बनाएं
छह पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगले दो माह में खाली कराने के आदेश के बाद सवाल उठ रहा है कि आगे क्या होगा? पूर्व सीएम के आवास खाली कराए जाएंगे या कोई रास्ता निकाला जाएगा। जो पूर्व सीएम आदेश से प्रभावित हो रहे हैं, वे सभी प्रमुख दलों, बसपा, बसपा, भाजपा, और कांग्रेस से जुड़े हैं।
सूत्रों के अनुसार, पहली नजर में दो विकल्प माने जा रहे हैं। पहला, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार रिव्यू पिटीशन दायर करे। दूसरा, विधानमंडल में एक्ट बनाकर पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन आवास आवंटित करने को कानूनी जामा पहनाया जाए।
आदेश पर उच्चस्तरीय मंथन
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद शासन में हलचल बढ़ गई। राज्य संपत्ति विभाग ने सोमवार शाम आदेश की प्रति मिलने के बाद इसके विभिन्न पहलुओं पर नोट तैयार कर वरिष्ठ अधिकारियों को उपलब्ध कराया। राज्य संपत्ति अधिकारी बृजराज सिंह यादव ने अधिकारियों से मिलकर आदेश के महत्वपूर्ण बिंदुओं की जानकारी दी। विभाग ने आदेश को लेकर ब्रीफ नोट तैयार किया है।
पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगलों की मरम्मत पर हर साल लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। राज्य संपत्ति विभाग पूर्व सीएम के बंगले की मरम्मत के लिए सालाना 25 लाख रुपये तक मंजूर कर सकता है जबकि इनसे किराया नाममात्र का लिया जाता है।
वर्ष 1997 में बनी मुख्यमंत्री आवास आवंटन नियमावली में किराया बढ़ाने के लिए दो बार संशोधन हो चुका, इसके बावजूद किराया बेहद कम है। एक से पांच एकड़ तक में बने इन बंगलों में विक्रमादित्य मार्ग स्थित मुलायम सिंह यादव के आवास का किराया सर्वाधिक 13478 रुपये मासिक है। सबसे कम 4625 रुपये किराया रामनरेश यादव के बंगले का है। दो बंगलों को जोड़कर बनाए गए मायावती के आवास का किराया 12500 रुपये प्रतिमाह है।
पॉश इलाकों में हैं 383 ट्रस्टों, सोसाइटी के बंगले
माल एवेन्यू में ही पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के नाम पर बने ट्रस्ट को बंगला आवंटित है। इसी तरह महातम राय ट्रस्ट और राजनारायण ट्रस्ट के नाम पर बंगले आवंटित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि बिना वैधानिक प्रावधान के ट्रस्टों, सोसाइटी व संस्थाओं का आवंटन निरस्त समझा जाए। राज्य सरकार जल्द से जल्द इन्हें अपने कब्जे में ले। इनसे उचित किराये की वसूली भी की जाए।
राज्य संपत्ति विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक कुछ ट्रस्टों के पास बंगले हैं, जबकि अन्य के पास अलग टाइप के भवन हैं। दिसंबर 2015 तक ट्रस्ट, सोसाइटीज या संस्थानों के नाम पर 383 संपत्तियों का आवंटन किया गया था।