पूर्ण गन्ना मूल्य भुगतान करने पर चीनी मिलों को छह रुपये प्रति क्विंटल की सरकारी रियायत देने की अवधि मंगलवार को पूरी हो गई। लेकिन अब तक सिर्फ 46 मिलों ने ही शत प्रतिशत गन्ना मूल्य का भुगतान किया है।
निजी क्षेत्र की 50 चीनी मिलों पर अब भी 3100 करोड़ रुपये गन्ना मूल्य अवशेष है। कुल बकाए में 2308 करोड़ रुपये (74 फीसदी) की देनदारी छह बड़े चीनी मिल समूहों पर है।
प्रदेश सरकार ने 30 सितंबर तक पूरा गन्ना मूल्य अदा करने वाली चीनी मिलों को छह रुपये प्रति क्विंटल की अतिरिक्त सहायता देने का निर्णय लिया था। सहकारी चीनी मिलों को इस पैकेज से अलग रखा गया था, क्योंकि सरकार उन्हें पहले ही आर्थिक सहायता दे चुकी है।
मुख्य सचिव आलोक रंजन ने बताया कि सरकार की पहल पर 46 चीनी मिलों ने पूरा मूल्य चुकता कर दिया है। उन्हें छह रुपये की रियायत दी जाएगी। उन्होंने बताया कि चीनी मिलों पर किसानों का अब 3100 करोड़ रुपये गन्ना मूल्य अवशेष रह गया है।
बजाज ग्रुप पर सबसे ज्यादा देनदारी
प्रदेश में अधिकतर मिलों ने गन्ना मूल्य अदा कर दिया है या उन पर बहुत कम बकाया है। सर्वाधिक 900 करोड़ रुपये गन्ना मूल्य का देनदार बजाज ग्रुप है। यह सबसे बड़ा चीनी मिल समूह है।
मवाना ग्रुप देनदारी के मामले में नंबर दो पर है। इस ग्रुप पर 470 करोड़ रुपये, मोदी ग्रुप पर 367, सिंभावली पर 225, बिड़ला ग्रुप पर 177 करोड़ और त्रिवेणी पर 169 करोड़ रुपये गन्ना मूल्य बकाया है।
फैजाबाद परिक्षेत्र की मिलों पर सबसे कम बकाया
सर्वाधिक 39 फीसदी गन्ना मूल्य मेरठ मंडल की चीनी मिलों पर बकाया है, जबकि सबसे कम 2.20 फीसदी गन्ना मूल्य फैजाबाद परिक्षेत्र की मिलों का अवशेष है।
सहारनपुर में 28, मुरादाबाद में 12, बरेली में 14, देवीपाटन में 14, गोरखपुर में 12, लखनऊ में 13.23 और देवरिया परिक्षेत्र में 12 फीसदी गन्ना मूल्य अवशेष है। अकेले मेरठ मंडल की चीनी मिलें किसानों की 976 करोड़ रुपये गन्ना मूल्य की बकायादार है।
किसानों को बंधाई उम्मीद
मामले पर चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास प्रमुख सचिव राहुल भटनागर ने कहा कि गन्ना किसानों को बकाया भुगतान दिलाना शासन की प्राथमिकता है। डेढ़ माह पहले चीनी मिलों पर 5500 करोड़ रुपये गन्ना मूल्य देय था, जो अब लगभग 3100 करोड़ रुपये रह गया है। इसका भी भुगतान शीघ्र करा दिया जाएगा
निरंकुश हैं बड़े चीनी मिल समूह
वहीं, सहकारी गन्ना समितियों के अध्यक्ष डॉ. अरविंद सिंह का कहना है कि सर्वाधिक बकाया उन चीनी मिलों पर जिनकी डिस्टिलरियां हैं, जो पावर जनरेशन कर रहे और इथेनॉल भी बना रहे हैं।
गन्ने से भारी मुनाफा कराने वाले ये ग्रुप निरंकुश होकर काम कर रहे हैं। सरकार के नरम रुख से अभी तक पिछले पेराई सत्र का भुगतान न मिलने से किसान बदहाल हैं।