बच्चों पर भी पड़ा असर: आईवीएफ के बाद जिन महिलाओं में टीबी हुआ, उनके बच्चों में भी टीबी का असर पाया गया। नवजात शिशुओं में 39.7 फीसदी में जन्मजात टीबी, 34.2 फीसदी में माइलरी टीबी और 15.1 फीसदी में सीएनएस पाई गई। ऐसे बच्चों में जन्म के तत्काल बाद तेज बुखार, लेने में कठिनाई, हेपाटोस्प्लेनोमेगेली, सेप्सिस जैसे लक्षण देखे गए। कई मामलों में नवजात टीबी की पुष्टि गर्भनाल (प्लेसेंटा), यकृत या मस्तिष्क से प्राप्त नमूनों में हुई।
टीबी बढ़ने की वजह: प्रो आरके गर्ग ने बताया कि आईवीएफ के दौरान हार्मोन (एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन) बढ़ जाते हैं। ये हार्मोन प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) को दबा देते हैं, जिससे शरीर में सुप्त टीबी सक्रिय हो जाती है। जिन महिलाओं में जननांग टीबी का इतिहास रहा है, उनमें यह जोखिम और अधिक बढ़ जाता है। नवजात में अस्पष्ट निमोनिया या सेप्सिस दिखे तो जन्मजात टीबी की जांच कराएं। लैटेंट टीबी यानी टीबी के जीवाणु शरीर में मौजूद हों और इसके लक्षण न दिखने की स्थिति पाई जाने पर पहले दवा से टीबी का इलाज किया जाए।