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ये शायर चार आने के चक्कर में पैदल पहुंच गए अमीनाबाद, पढ़ें ये वाक्या

Mon, 17 Dec 2018 04:34 PM IST
ishwar ashish अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
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मौलाना हसरत मोहानी
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मौलाना हसरत मोहानी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और बड़े शायर थे। वह संविधान सभा के सदस्य भी रहे। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना में भी मोहानी साहब का योगदान रहा। उन्नाव के मोहान कस्बा में पैदा हुए सैयद फज्लुल्हसन के नाम के साथ उनके पैतृक घर मोहान का नाम ऐसा लगा कि अपना तखल्लुस ‘हसरत मोहानी’ रख लिया।
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वह लखनऊ में ही रहते थे। पूर्व मंत्री काजी जलील अब्बासी ने अपने एक संस्मरण में लिखा हैै, ‘एक दिन मुझे हसरत मोहानी साहब से मिलना था। उस समय वह राजा महमूदाबाद की कैसरबाग स्थित कोठी पर थे। मुझे मालूम हुआ तो मैं वहीं पहुंच गया। थोड़ी देर के बाद वह बाहर आए तो मैं भी उनके साथ हो लिया।

मौलाना को चारबाग रेलवे स्टेशन जाना था। उन्होंने एक इक्के वाले से पूछा, ‘भाई क्या किराया लोगे?’ इक्के वाले ने जो किराया बताया वह मौलाना को ज्यादा लगा। मौलाना बोले, ‘भाई ज्यादा है। यहां से तो चार आने (लगभग 24 पैसा) ही लगता है।’
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बोले- पैसा उपयोग के लिए होता है दुरुपयोग के लिए नहीं।’

मौलाना हसरत मोहानी - फोटो : डेमो
मौलाना जिससे पूछते वह जो किराया बताता तो वह यही जवाब देते, ‘बहुत ज्यादा है।’ किराया पूछते और बात करते-करते हम लोग अमीनाबाद पहुंच गए, जहां मौलाना साहब ने एक इक्के वाले से फिर किराया पूछा। उसने बताया, ‘चार आने।’

मोहानी साहब ने किराया सुना और इक्के पर बैठ गए। मैं उन्हें देखते हुए यह सोचने लगा, ‘इतना बड़ा नेता व शायर पर एक-एक पैसे का हिसाब। मौलाना शायद हमारी उलझन समझ गए। बोले, ‘पैसा उपयोग के लिए होता है दुरुपयोग के लिए नहीं।’
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